
फसल बीमा योजना: आठ साल में कंपनियों की कमाई 75 हजार करोड़, किसान अब भी ठगा हुआ!
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फसल बीमा योजना को किसान हितैषी बताकर पेश किया जाता है, लेकिन असल खेल कहीं और है. आंकड़े साफ दिखाते हैं कि मुआवजा देने से ज्यादा मोटी कमाई बीमा कंपनियां कर रही हैं. किसान फसल खराब होने पर मुआवजे के लिए दर-दर भटकते हैं, जबकि कंपनियां सरकार और किसानों दोनों से मोटा प्रीमियम वसूलकर मालामाल हो रही हैं. सवाल यह है कि जब सर्वे और आकलन सरकार करती है, तो आखिर इन कंपनियों का रोल है क्या?
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) का दावा है कि किसानों को कम प्रीमियम पर ज्यादा मुआवजा दिया जा रहा है. लेकिन जब आंकड़ों की पड़ताल की जाती है तो तस्वीर कुछ और ही निकलती है. असली फायदा किसानों का नहीं, बल्कि बीमा कंपनियों का हो रहा है. इसी बारे में कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाल ही में कहा कि 2016 से अब तक किसानों ने करीब 36 हज़ार करोड़ का प्रीमियम दिया, जबकि 1.83 लाख करोड़ रुपये क्लेम के तौर पर बांटे गए. पहली नज़र में यह बयान किसान हितैषी लगता है, लेकिन असलियत इससे अलग है.
कंपनियों की बल्ले-बल्ले
पूरा खेल प्रीमियम के तीन हिस्सों किसान, राज्य और केंद्र सरकार का है. चौहान ने सिर्फ किसानों के हिस्से का जिक्र किया, जबकि बाकी रकम का जिक्र गायब रहा. दरअसल योजना शुरू होने के बाद से बीमा कंपनियों ने 2.56 लाख करोड़ रुपये का प्रीमियम लिया और सिर्फ 1.81 लाख करोड़ रुपये क्लेम के तौर पर लौटाया. यानी करीब 75 हज़ार करोड़ रुपये का फायदा उनकी जेब में गया. सालाना औसत मुनाफा करीब 9,400 करोड़ रुपये है.
सरकार क्यों छुपा रही पूरी तस्वीर?
सवाल ये है कि राज्य और केंद्र सरकार का जो हिस्सा प्रीमियम के रूप में कंपनियों को जाता है, क्या वो भी देश के टैक्सपेयर का पैसा नहीं है? सरकारी विज्ञप्तियों में हमेशा यही दिखाया जाता है कि किसानों ने थोड़ा दिया और बदले में बहुत पाया. लेकिन असली रकम का बड़ा हिस्सा कंपनियों के पास ही ठहर जाता है.
आखिर है क्या कंपनियों का काम?

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