
पुरी के शंकराचार्य नहीं आएंगे अयोध्या, सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट पीएन मिश्रा बोले- उनकी है अपनी मर्यादा
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सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट पीएन मिश्रा ने आजतक के साथ बातचीत करते हुए कहा कि किसी भी आयोजन में जगद्गुरु शंकराचार्य की अपनी मर्यादा होती है. दरअसल, पुरी के शंकराचार्य ने अयोध्या जाने से इंकार कर दिया था. उन्होंने कहा था कि मैं वहां ताली बजाने जाऊंगा क्या. इस मामले में पीएन मिश्रा ने अपनी बात रखी. वह कानून के साथ धार्मिक और इतिहास के विशेषज्ञ भी हैं.
शंकराचार्यों की मर्यादा है कि वे न किसी की पूजा का पौरोहित्य कर सकते हैं न यजमान हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में उनकी उपस्थिति ही वहां होगी. इसी स्थिति पर शायद पुरी पीठ के शंकराचार्य ने शायद कहा होगा कि हम वहां ताली बजाने जाएंगे क्या? शंकराचार्यों के सम्मेलन समय-समय पर हुए हैं. वैसे ऐसे समारोहों में अमूमन चारों शंकराचार्य विरले ही इकट्ठा होते हैं.
उनके अपने प्रोटोकॉल हैं, जिनसे समझौता नहीं किया जा सकता. वहीं, आयोजकों के अपने प्रोटोकॉल हैं, जिनमें सुरक्षा और व्यवस्था दोनों शामिल हैं. यह कहना है सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट पीएन मिश्रा का. वह आदि शंकराचार्य के जीवनवृत्त पर शोध ग्रंथ लिख चुके हैं, पीएन मिश्रा ने कहा कि देश में चार शंकराचार्य होते हैं.
कभी समझौता नहीं करती न्याय सत्ता और धर्म सत्ता
उत्तर में ज्योतिष्पीठ, दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में गोवर्धन और पश्चिम में शारदा पीठ. इन चारों पीठों पर अपने शिष्यों को नियुक्त कर आदिशंकराचार्य ने अपना निवास कांची में बनाया. आगे चल कर वहां के प्रमुख भी शंकराचार्य की पदवी में आ गए. शंकराचार्य की नियुक्ति और प्रशिक्षण, उत्तराधिकारी बनाए जाने की पूरी प्रक्रिया आद्य शंकराचार्य ने मठाम्नाय और महानुशासन में लिख रखा है.
मगर, फिर भी इतिहास में कभी राजाओं ने, तो कभी सरकारों ने अपने प्रभाव से विवाद पैदा किए और अपनी मर्जी चलाई. रजवाड़ों के समय, अंग्रेजों के समय और फिर लोकतंत्र में भी शंकराचार्य पद पर नियुक्ति को लेकर विवाद हुए. पुलिस फौजदारी हुई. कोर्ट कचहरी तक मामला गया. मगर, न्याय सत्ता और धर्म सत्ता कभी समझौता नहीं करती. नियमानुसार चलती हैं. न्याय सत्ता, कानून और धर्मसत्ता ग्रंथों के नियम से बंधी होती है. वहां व्यक्ति नहीं व्यवस्था की चलती है.
जगन्नाथपुरी मठ के शंकराचार्य ने किया था विरोध

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