पति की पिटाई, आंसू-दर्द-ताने सहे न गए, घर छोड़ ऐसे तय किया IAS तक का सफर
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ससुराल में तिरस्कार, अपमान और घरेलू हिंसा अक्सर औरत का कलेजा छलनी कर देती है. बहुत कम महिलाएं ऐसी होती हैं जो ससुराल से मिली प्रताड़ना की खिलाफत कर पाएं. सविता प्रधान जैसी हस्तियां विरली ही हैं जिन्होंने अपने हौसले, आत्मविश्वास और कड़ी मेहनत से पूरी कहानी ही पलट दी...
"मैं ससुराल की यातनाओं से तंग आ चुकी थी. छोटी-छोटी बातों पर पति ऐसे पीट देता था जैसे मैं कोई जानवर हूं. दो बच्चों के जन्म के बाद कमजोरी मेरे शरीर में जैसे घर बना चुकी थी. खाने को भी नापतौल कर मिलता था. मैं धीरे-धीरे मर रही थी. हर दिन अपमान और प्रताड़ना ने मेरी आत्मा को छलनी कर दिया था. अब मेरी सहनशक्ति धीरे धीरे जवाब देने लगी थी. एक दिन मैंने वो कदम उठाने की सोची जिसे सोचकर आज भी मेरी रूह कांप जाती है."
ये कहानी है मध्य प्रदेश में ज्वाइंट डायरेक्टर सविता प्रधान की. उनकी ऑफिसर बनने की कहानी कोई आम सक्सेस स्टोरी भर नहीं है. ये कहानी है एक मुरझाए पौधे को हिम्मत की खाद और आंसुओं से सींचकर फिर से हरा करने की. aajak.in से बातचीत में उन्होंने अपनी कहानी साझा की.
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के मंडई गांव में जन्मी सविता प्रधान बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में तेज़ थीं. वह अपने गांव में 10वीं क्लास पास करने वाली पहली लड़की थीं. पिता को अपनी होनहार बेटी पर बड़ा गर्व हुआ. आर्थिक स्थिति कुछ खास नहीं थी तो अच्छी पढ़ाई मिलना बड़ा मुश्किल था. फिर भी 11वीं-12वीं की पढ़ाई नज़दीक के पल्हेड़ा गांव जाकर जैसे तैसे जारी रखी. इसी बीच सविता के लिए एक बड़े घर से शादी का रिश्ता आया. लड़के के पिता डिस्ट्रिक्ट जज थे. उन्होंने कहा कि हमारी भी एक बेटी इसी उम्र की थी जो गुजर गई, वो डॉक्टर बनना चाहती थी. अब हम अपनी बहू को डॉक्टर बनाएंगे. सविता के पिता के पास इस रिश्ते को नकारने की कोई वजह नहीं थी. सविता उस समय 12वीं भी पास नहीं हुई थीं और लड़का उनसे 11-12 साल बड़ा था. इस सबके बावजूद, 1998 में 16 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई.
नर्क जैसी थी ससुराल की जिंदगी ससुराल पहुंचने के बाद सविता ने अपने जीवन का सबसे भयावह दौर जिया. पढ़ाई की बात घर पर फिर कभी उठी ही नहीं. वह सुबह से शाम तक घर के कामों में झोंक दी गईं. उम्र काफी छोटी थी, पति ने जल्दी ही मारपीट भी शुरू कर दी. इतना ही नहीं, खाना भी उन्हें तभी खाने को मिलता जब सबके खा लेने के बाद कुछ बचता. अगर खाने को कुछ नहीं बचता तो उन्हें भूखा रहना पड़ता. दोबारा खाना बनाने की इजाज़त नहीं थी. वह अक्सर खाना बनाते समय कुछ रोटियां अपने कपड़ों में छिपा लेतीं और बाद में बाथरूम में जाकर सूखी रोटी खाकर ही अपना पेट भरतीं. हालांकि, हर दिन ऐसा कर पाना मुमकिन नहीं था. 19 साल की उम्र में उनका वज़न 38 किलो हो गया था. सविता को एहसास होने लगा था कि वो एक धीमी मौत मर रही हैं. इसी दौरान उन्होंने सवा साल के अंतर पर 2 बेटों को जन्म दिया. शरीर और कमजोर हो चुका था. भीतर से तो न जाने कब की टूट चुकीं थीं. फिर एक वक्त आया जब उन्होंने तय किया कि वह ऐसी जिंदगी नहीं जी सकती.
मन करता था, जहर दे दूं या... सविता बताती हैं कि उन्हें हर दिन यह ख्याल आने लगे कि वह सबको जहर देकर मार दें. फिर उन्होंने सोचा कि क्यूं न खुद को ही मार दूं. उन्होंने फांसी का फंदा तैयार किया और खुद को लटकाने के लिए पलंग पर स्टूल भी रख लिया. उन्होंने बताया, 'मैंने दरवाजा तो बंद कर लिया था मगर खिड़की बंद करना भूल गई थी. तभी मेरी सास खिड़की के सामने से गुजरी. हम दोनों ने एक दूसरे को एक पल रुककर देखा... मगर फिर वो आगे बढ़ गईं, जैसे उन्होंने कुछ देखा ही नहीं. उस पल मेरे मन ने मुझसे चीखकर कहा कि इन लोगों के लिए अपनी जान देने की भला क्या जरूरत... मरना होगा तो मर जाउूंगी मगर इन लोगों के लिए नहीं. यही सोचकर मैंने अपने दोनों बच्चों को सीने से लगाया और घर से निकल गई.'
घर छोड़ने पर भी कम नहीं हुईं मुश्किलें 21 साल की उम्र में वह अपने 2 बेटों को लेकर घर से निकल गईं. बड़ा बेटा केवल डेढ़ साल का था जिसने अभी चलना ही सीखा था, जबकि छोटा बेटा केवल 4 महीने का था जो अभी मां का दूध पीता था. सविता सहरोल में अपने ससुराल से निकलकर भोपाल आ गईं. उनके पति की एक दूर की बहन उनसे काफी लगाव रखती थीं. वह उन्हीं भाई-बहन के घर आ गईं. इसकी जानकारी जब सविता की मां को लगी तो उन्होंने अब सबकुछ छोड़कर अपनी बेटी का साथ देने का फैसला किया. वह भी बेटी के साथ रहने आ गईं. एक 900 रुपये के किराए के कमरे में सविता अपनी मां, दो बच्चे और अपनी ननद और उसके भाई के साथ रहने लगीं.

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