
डराने वाली तेजी से फैल रहा है दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान, इतने साल पहले हुआ करती थीं झीलें और आबादी
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दुनिया के सबसे बड़े रेगिस्तान 'सहारा' की बात सुनकर जहन में रेत ही रेत और गर्मी की तस्वीर बनती है. अफ्रीका के इस रेगिस्तान ने दुनिया के 8 फीसदी जमीनी हिस्से पर कब्जा कर रखा है, और कुल 10 देशों में फैला हुआ है. ऐसे में कोई शायद ही सोच सके कि एक समय पर ये हरा-भरा जंगल हुआ करता, जहां बारिश होती थी.
ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने के साथ दुनियाभर में रेगिस्तान अपना आकार बढ़ा रहे हैं. यहां तक कि खुद सहारा मरुस्थल हर साल लगभग 45 किलोमीटर की रफ्तार से फैल रहा है. ऐसे में साइंटिस्ट चेता रहे हैं कि यही हाल रहा तो दुनिया में उपजाऊ जमीन कम और रेगिस्तान ही रेगिस्तान हो जाएंगे, जहां लोगों की जिंदगी मुश्किल हो जाएगी.
क्या होता है रेगिस्तान और क्यों बनता है? मरुस्थल सुनते ही लगता है, जहां रेत ही रेत हो, लेकिन सिर्फ यही नहीं, जहां भी पेड़-पौधे कम होते जाते हैं, और उनकी जगह चट्टानें और बंजर जमीन लेने लगती है, वो रेगिस्तान के बनने की शुरुआत है.
बारिश में भी ये फर्क आ जाता है जमीन की क्वालिटी बदलने के साथ एक और फर्क आता है, ऐसी जगहों पर बारिश कम होने लगती है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, जिस इलाके में साल में 25 सेंटीमीटर से कम बारिश दर्ज होती है, उसे रेगिस्तान मान लिया जाता है. यहां बता दें कि किसी भी जगह सालभर में एक निश्चित बारिश होती है, जो उस जगह को सामान्य या मरुस्थल बनता है. भारत में औसत बारिश 120 सेमी है, जो अलग-अलग महीनों को मिलाकर बनती है. जहां एवरेज रेन घटकर कुछ ही प्रतिशत बाकी रहे, वो रेगिस्तानी इलाका कहलाने लगता है.
कैसे पता लगा इंसानी अस्तित्व? अब बात करें सहारा की, तो 90 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला ये मरुस्थल पूरे यूरोप महाद्वीप के लगभग बराबर है. ये लगभग 10 देशों में फैला हुआ है और ज्यादातर हिस्सा वही है, जहां इंसान तो क्या जीव-जंतु भी न रह सकें. दिन में यहां भयंकर गर्मी और रात में बेहद ठंड पड़ने लगती है. लेकिन आज से लगभग 6 हजार साल पहले यहां जंगल हुआ करते थे. इसका ज्यादा हिस्सा झीलों और पेड़-पौधों से भरा हुआ था. जाहिर है, कि यहां जीवन भी रहा होगा. इसके प्रमाण वैज्ञानिकों को इस तरह से मिले कि साल 2005-2006 के बीच कई कब्रों का पता लगा. साथ ही पशुओं और पानी में रहने वाले जीवों के भी अवशेष मिले.
फिर जंगल कैसे बन गया रेगिस्तान? इस बारे में साइंटिस्ट भी ज्यादा कुछ नहीं जानते. अनुमान के आधार पर कई बातें कही जाती हैं. जैसे साल 2017 में फ्रंटियर्स इन अर्थ साइंस में छपी स्टडी में आर्कियोलॉजिस्ट्स ने माना कि ये सदियों तक चला प्रॉसेस होगा, जिसकी वजह इंसान रहे होंगे. ह्यूमन्स एज एजेंट्स इन टर्मिनेशन ऑफ अफ्रीकन ह्यूमिड पीरियड में अनुमान लगाया गया कि 6000 से 4500 सालों पहले बदलाव आया होगा.
इसमें थोड़ी वजह इंसानी गलतियां और एक हिस्सा पृथ्वी की ऑर्बिट में बदलाव का रहा होगा. किसी को भी नहीं पता कि उस समय पक्के तौर पर क्या हुआ होगा कि हरी-भरी जगह रेत और गर्मी में बदल गई. लेकिन अब जो हो रहा है, वो ज्यादा डरावना है.

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