
जातिगत भेदभाव, अस्थायी नौकरियों से जूझ रहे हैं देश के सफाई कर्मचारी
The Wire
शहरी भारत में स्वच्छता सेवाओं के निजीकरण के साथ सफाई कर्मचारी जातिवाद, मज़दूरी में कटौती, और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार न मिलने से भी जूझ रहे हैं. स्वच्छता कर्मियों को पूरी तरह ठेके पर भर्ती करने का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है. स्थायी नियुक्तियां घट रही हैं और वाल्मीकि समुदाय के कामगारों को अधिकतर अस्थायी भूमिकाओं तक ही सीमित किया जा रहा है.
अगस्त 2025 से चेन्नई में हजारों सफाईकर्मी सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. यह विरोध राज्य सरकार के उस निर्णय के खिलाफ है, जिसमें कचरा उठाने और सड़कों की साफ-सफाई का काम बड़े निजी ठेकेदारों को सौंपने का ऐलान किया गया था.
हालांकि, यह समस्या केवल चेन्नई तक सीमित नहीं है. जैसे-जैसे शहरों में घर-घर से कचरा इकट्ठा करने के काम में निजीकरण बढ़ा है, नगर पालिकाओं में स्थायी कर्मचारियों की जगह कॉन्ट्रैक्ट लेबर, यानी ठेके के श्रमिकों की भर्ती में वृद्धि हुई है. लखनऊ, अहमदाबाद और सूरत जैसे शहर ‘न्यू क्लीन सिटी’ का पुरस्कार तो जीतते हैं, लेकिन यह उन कामगारों की जमीनी हकीकत से बिल्कुल विपरीत है, जो इन शहरों को साफ रखते हैं. ऐसे में धरातल पर साफ-सफाई से जुड़े काम की वास्तविकता को समझना जरूरी हो जाता है.
सबसे जरूरी यह समझना है कि यह काम करता कौन है? जाति-आधारित सामाजिक और व्यावसायिक भेदभाव की जड़ें कितनी गहरी हैं, यह इस बात से पता चलता है कि दलित और अन्य ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदाय आज भी स्वच्छता और कचरा प्रबंधन कार्यों में सबसे अधिक संख्या में मौजूद हैं.
वर्ष 2023–24 में सरकार द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, जिसमें 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 3,000 शहरी निकायों से 38,000 कामगार शामिल थे, शहरी सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई में लगे लगभग 92 प्रतिशत लोग अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदायों से थे. उत्तर और पश्चिम भारत में वाल्मीकि, भंगी, मेहतर और चूड़ा; पूर्वी भारत में बसफोर, डोम और घासी; तथा दक्षिण भारत में थोटी, अरुंथथियार और मादिगा जैसी दलित उपजातियां साफ-सफाई से जुड़े कामों की श्रृंखला में शामिल रही हैं.
एक अनुमान के अनुसार इन समुदायों के लगभग 60 लाख परिवार हैं, जिनमें से 40–60 प्रतिशत आबादी साफ-सफाई से जुड़े अत्यंत जोखिमपूर्ण काम करती है.
वर्ष 2023 और 2024 में पश्चिम भारत स्थित श्रम अधिकार संगठन, सेंटर फॉर लेबर रिसर्च एंड एक्शन (सीएलआरए) ने दो अध्ययन किए, ताकि निजीकरण और कॉन्ट्रैक्ट प्रणाली का स्वच्छता कर्मियों पर प्रभाव समझा जा सके. हमने अहमदाबाद और सूरत में कॉन्ट्रैक्ट श्रमिकों, स्थायी कर्मचारियों और स्व-रोजगार के रूप में वर्गीकृत लोगों से बातचीत की. इस बातचीत में यह सामने आया कि कचरा और स्वच्छता क्षेत्र में हो रहे बदलाव जाति-आधारित असमानताओं को और जटिल बना रहे हैं, जिससे कामगारों की स्थिति और अधिक असुरक्षित होती जा रही है.

यह त्रासदी नवंबर 2014 में बिलासपुर ज़िले के नेमिचंद जैन अस्पताल (सकरी), गौरेला, पेंड्रा और मरवाही में आयोजित सरकारी सामूहिक नसबंदी शिविरों के दौरान हुई थी. ज़िला अदालत ने आरोपी सर्जन को ग़ैर-इरादतन हत्या का दोषी ठहराया और दो साल की क़ैद, 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया. साथ ही पांच अन्य आरोपियों को बरी कर दिया.

वी-डेम की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के अंत तक दुनिया में 92 तानाशाही वाले देश और 87 लोकतांत्रिक देश मौजूद थे. भारत अभी भी 'चुनावी तानाशाह' बना हुआ है, इस श्रेणी में वह 2017 में शामिल हुआ था. 179 देशों में सें भारत लिबरल डेमोक्रेसी इंडेक्स में 105वें स्थान पर है. पिछले वर्ष यह 100वें स्थान पर था.

बीते 3 फरवरी को बजट सत्र के पहले चरण के दौरान लोकसभा द्वारा पारित एक प्रस्ताव के बाद अनुशासनहीन व्यवहार के लिए सात कांग्रेस सांसदों और एक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सांसद को निलंबित कर दिया गया था. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सोमवार को सभी दलों के नेताओं की एक बैठक बुलाई थी, जिसमें इन सदस्यों का निलंबन वापस लेने पर सहमति बनी.

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मनरेगा के राज्य-स्तरीय तथ्य एक राजनीतिक रूप से असहज स्वरूप दिखाते हैं. यह कार्यक्रम उन इलाकों में सबसे सफल नहीं रहा जहां ज़रूरत सबसे ज़्यादा थी, बल्कि वहां बेहतर रहा जहां प्रशासनिक ढांचा मज़बूत और राजनीतिक इच्छाशक्ति स्पष्ट थी. केरल और ओडिशा के आंकड़े बताते हैं कि मनरेगा अधिकार से अधिक प्रशासनिक योजना बन गई है, ऐसे में वीबी-जी राम जी को क्या अलग करना होगा?

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