
छोटा सा काला तिल मकर संक्रांति के दिन इतना जरूरी क्यों हो जाता है?
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मकर संक्रांति के अवसर पर तिल का धार्मिक, सांस्कृतिक और आयुर्वेदिक महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है. तिल से स्नान, दान, और भोजन करने की परंपरा पाप नष्ट करने और स्वास्थ्य लाभ देने वाली मानी जाती है. मिथिला क्षेत्र में तिल-तिल बहबे की परंपरा से परिवार में प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है.
मकर संक्रांति के मौके पर स्नान-ध्यान और दान का महत्व है. इस दिन तिल का उपयोग खास तौर पर किया जाता है. जो लोग संक्रांति स्नान के लिए नदी तट पर नहीं जा पाते हैं उनके लिए कहा गया है कि वह तिल मिले जल से स्नान करें तो उन्हें तीर्थ स्नान का फल मिल जाता है. इसके अलावा सर्दी के मौसम तिल सिर्फ खाद्य पदार्थ नहीं औषधि बन जाता है.
तिल का आयुर्वेद में बड़ा ही महत्त्व हैं.
तिलस्नायी तिलोद्वर्ती तिलहोमी तिलोदकी । तिलभुक् तिलदाता च षट्तिलाः पापनाशनाः ।।
यानी तिल मिले जल से स्नान, तिल के तेल से शरीर में मालिश, तिल से ही यज्ञ में आहुति, तिल मिले जल को पीना और भोजन में तिल का प्रयोग और तिल का दान षट्तिला में तिल के ये छह प्रकार के कार्य करने से पर्व का लाभ मिलता है और पाप नष्ट हो जाते हैं. इस बार मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी एक ही दिन है और सनातन परंपरा में दोनों ही पर्व तिल के महत्व को बताने वाले हैं.
तिल की उत्पत्ति की कहानी कहते हैं कि जब हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रहलाद पर लगातार अत्याचार कर रहा था तो यह देखकर भगवान विष्णु क्रोध से भर उठे. गुस्से में उनका सारा शरीर पसीने से भींग गया. यह पसीना जब जमीन पर गिरा तब तिल की उत्पत्ति हुई. तिल को गंगाजल के ही समान पवित्र माना गया है. माना जाता है कि जिस तरह गंगा जल का स्पर्श मृत आत्माओं को वैकुंठ के द्वार तक पहुंचा देता है ठीक इसी तरह तिल भी पूर्वजों, भटकती आत्माओं और अतृप्त जीवों को मोक्ष का मार्ग दिखाता है. इसलिए तिल धार्मिक तौर पर भी बहुत महत्वपूर्ण बन जाता है.

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