
'चाहे नमक-रोटी खाएं पर मोदीया को...' इस बार कैसा है बिहार की जनता का मूड, पढ़ें- ग्राउंड रिपोर्ट
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पटना से समस्तीपुर तक... और पुनपुन के दलदली रास्तों से दरभंगा की गलियों तक, एक हफ्ते की यात्रा में साफ दिखा कि बिहार बदला जरूर है, लेकिन कुछ तो अधूरा है. सड़कें चमक रही हैं, लेकिन नल सूखे हैं. महिलाएं सुरक्षित महसूस कर रही हैं मगर नौजवान अब भी नौकरी के इंतज़ार में हैं. एनडीए को अब भी भरोसा और भावनाओं का साथ मिल रहा है पर सिस्टम की सच्चाई ने लोगों के भरोसे में दरार डाल दी है.
बिहार में हर तरफ चुनावी सरगर्मी तेज हो चुकी है. हर तरफ राजनीति की चौपालें सजी हुई हैं. ऐसे में हमने बिहार की जनता का मन भांपने की कोशिश की. जैसे ही हमारी फ्लाइट पटना एयरपोर्ट पर उतरी, सबसे पहले नजर पड़ी- बदलाव पर. नया टर्मिनल चमकदार था, चढ़ते ही छठ महापर्व की झलक दिखाने वाले पोस्टर स्वागत कर रहे थे. महसूस हुआ कि राजधानी जैसे अपनी पुरानी छवि को बदलने की कोशिश कर रही है.
बाहर टैक्सी में बैठते ही मैंने ड्राइवर से वही पुराना सवाल पूछा, 'माहौल कैसा है?' वो मुस्कुराया और बोला, 'भैया, इस बार तो मोदी जी को ही लाएंगे... चाहे नमक-रोटी खाएं, पर मोदीया को जिताएंगे!'
मैं हंसा और दूसरा सवाल पूछ लिया, 'NDA को फिर से, क्यों?' वो बोला, 'लालू के टाइम में क्या ऐसे साफ सड़कें थीं? डर का माहौल था. अब कम से कम सुकून से सफर तो कर लेते हैं.'
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