
कहानी मेरी जुबानी: चीखों की गूंज, आंसुओं का सैलाब, उजड़े परिवार... लेबनान में त्रासदी जैसे हालात
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लेबनान के युद्ध क्षेत्र से रिपोर्टिंग करते हुए आज तक के वरिष्ठ पत्रकार अशरफ वानी ने बताया कि जंग सिर्फ गोलियों और धमाकों की नहीं, बल्कि डर, जिम्मेदारी और सच के बीच संतुलन की लड़ाई भी है. हर दिन मौत के साये में काम करते हुए उन्होंने तबाही, विस्थापन और इंसानी पीड़ा को करीब से देखा. ईद के दिन भी रिपोर्टिंग जारी रही. यह अनुभव सिर्फ कवरेज नहीं, बल्कि ऐसे सच का गवाह बनने की जिम्मेदारी थी- जहां हर पल जिंदगी और मौत के बीच फैसला लेना पड़ता है.
युद्ध क्षेत्र में सबसे पहली सीख यही मिलती है कि खामोशी कभी सचमुच खामोश नहीं होती. वह भीतर कहीं गूंजती रहती है- तनाव से भरी, किसी भी पल टूटने को तैयार. पंद्रह दिनों तक यही गूंज मेरी जिंदगी का हिस्सा रही, जब मैं लेबनान में इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच संघर्ष के मोर्चे से रिपोर्टिंग कर रहा था.
हर सुबह एक जैसी शुरू होती थी- यह देखने से कि रात ने हमें बख्शा या नहीं. सहकर्मियों के संदेश, परिवार की मिस्ड कॉल्स, और नए हमलों की सूचनाएं. फिर तैयारी का वही क्रम- हेलमेट, फ्लैक जैकेट, माइक और कैमरा- ऐसे औजार जो मेरे काम के लिए जरूरी भी थे और अपर्याप्त भी लगते थे.
टेलीविजन जर्नलिज्म तत्परता मांगती है. यह सुरक्षा का इंतजार नहीं करती और न ही हिचकिचाहट को बर्दाश्त करती है. जब बमबारी शुरू होती, हम भागते नहीं थे. हम हमले वाली जगह के और करीब जाते थे, सही एंगल तलाशते हुए, तबाही को फ्रेम करते हुए, और मजबूत सिग्नल की तलाश में रहते थे, ताकि दुनिया को हकीकत दिखा सकें. विडंबना यह थी कि जब बाकी लोग शेल्टर ढूंढते थे, हम और क्लियर एंगल की तलाश में होते थे.
चुनौतियां लगातार बनी रहीं. लाइव जाने से ठीक पहले नेटवर्क चला जाता. जिन रास्तों से हम एक घंटे पहले गुजरे होते, वे अचानक मलबे में तब्दील हो जाते या नए हमलों के बाद खतरनाक घोषित कर दिए जाते. कभी छतों से तो कभी बेसमेंट से ब्रॉडकास्ट करना पड़ता- सिग्नल और सिक्योरिटी, दोनों में तालमेल साधते हुए.
कई बार ऐसा लगा कि पत्रकारिता से ज्यादा अहम जीवित रहना है. तोप के गोलों की आवाज सोचने का मौका नहीं देती. वह आपको तुरंत फैसला लेने पर मजबूर करती है- मौके पर रुककर रिपोर्ट करें या वहां से दूर हटकर अपनी जान बचाएं. फिर भी, कैमरा चलता रहा. क्योंकि कहानी, सच... वहीं सामने घटित हो रही थी, और दुनिया को उसे देखना जरूरी था.

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