
खालिस्तान: जंग-ए-आजादी से कनेक्शन, भिंडरावाले का अतीत... कैसे भड़कता गया सिखों का आंदोलन
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खालिस्तान की मांग आज फिर तेज होने लगी है. खालिस्तान के समर्थकों ने शुक्रवार को अमृतसर में जमकर बवाल भी किया. खालिस्तान की मांग कोई नई बात नहीं है. इसका कनेक्शन जंग-ए-आजादी की लड़ाई से भी है. जानते हैं कि आजादी ने कैस इस मांग को भड़काया, फिर 80 से 90 के दशक में इसने कैसे हिंसा बढ़ाई?
अमृतपाल सिंह 'वारिस पंजाब दे' संगठन का मुखिया है. इस संगठन को पंजाबी एक्टर-एक्टिविस्ट दीप सिंह सिद्धू ने शुरू किया था. पिछले साल फरवरी में कार एक्सीडेंट में दीप सिद्धू की मौत हो गई थी. उनकी मौत के बाद अमृतपाल वारिस पंजाब दे का मुखिया बन गया.
अमृतपाल सिंह खालिस्तान का समर्थक है और वो अक्सर इस पर बयान देता रहता है. उसने गृहमंत्री अमित शाह को सीधे तौर पर धमकी भी दी थी. उसने कहा, 'अमित शाह ने कहा था कि वो खालिस्तान आंदोलन को आगे नहीं बढ़ने देंगे. मैंने कहा था कि इंदिरा गांधी ने भी ऐसा ही किया था. अगर आप भी ऐसा ही करेंगे तो आपको उसका खमियाजा भुगतना पड़ेगा.'
उसने कहा था कि जब लोग हिंदू राष्ट्र की मांग कर सकते हैं तो हम खालिस्तान की मांग क्यों नहीं कर सकते. इंदिरा गांधी ने खालिस्तान का विरोध करने की कीमत चुकाई थी.
खालिस्तान माने क्या...?
लेकिन ये खालिस्तान क्या है? जिसकी चर्चा आए दिन होती रहती है. ये जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा. इसकी कहानी शुरू होती है 31 दिसंबर 1929 से.
उस समय लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ. इसमें मोतीलाल नेहरू ने 'पूर्ण स्वराज्य' की मांग की. कांग्रेस की मांग का तीन समूहों ने विरोध किया. पहला- मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग. दूसरा- भीमराव अंबेडकर की अगुवाई वाला दलित समूह. और तीसरा- मास्टर तारा सिंह का शिरोमणि अकाली दल. तारा सिंह ने पहली बार सिखों के लिए अलग राज्य की मांग की थी.

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