
ओडिशा: आंगनबाड़ी में दलित समुदाय से आने वाली रसोइया की नियुक्ति, अभिभावकों ने बच्चों को भेजना बंद किया
The Wire
केंद्रपाड़ा ज़िले के नुआगांव गांव के आंगनबाड़ी केंद्र में 20 नवंबर को एक दलित महिला को सहायक-सह-रसोइया नियुक्त किया गया था. इसके बाद ग्रामीणों ने या तो अपने बच्चों को केंद्र भेजना बंद कर दिया या कुछ लोग राशन घर ले जाने लगे. प्रशासन द्वारा 11 फरवरी को तीन महीने से जारी बहिष्कार को सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझाने के लिए बुलाई गई बैठक में ग्रामीण शामिल नहीं हुए.
नई दिल्ली: ओडिशा के केंद्रपाड़ा ज़िले के एक आंगनबाड़ी केंद्र में पिछले तीन महीनों से लगभग कोई उपस्थिति दर्ज नहीं हुई है, क्योंकि यहां नामांकित बच्चों के माता-पिता ने एक दलित महिला को सहायक-सह-रसोइया नियुक्त किए जाने के विरोध में अपने बच्चों को भेजना बंद कर दिया है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, नुआगांव गांव के इस आंगनबाड़ी केंद्र में 20 नवंबर को 21 वर्षीय सरमिस्ता सेठी की नियुक्ति की गई थी. इसके बाद ग्रामीणों ने या तो अपने बच्चों को केंद्र भेजना बंद कर दिया या कुछ मामलों में राशन घर ले जाने लगे.
सरमिस्ता, जो स्नातक हैं और तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं, इस नौकरी के लिए अपने गांव से आवेदन करने वाली इकलौती व्यक्ति थीं. भले ही इसमें केवल 5,000 रुपये महीने का मामूली वेतन मिलता है, फिर भी वह खुश थीं. उन्होंने इस विवाद पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.
एक अन्य आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, लिज़ारानी पांडव ने बताया कि गांव के कई लोग उनकी नियुक्ति से नाराज़ हैं. इस केंद्र में 6 महीने से 3 साल तक के 22 बच्चे और 3 से 6 साल तक के 20 बच्चे नामांकित हैं. यहां सत्तू और अंडे जैसे खाद्य पदार्थ दिए जाते हैं. आम तौर पर बड़े बच्चे आंगनबाड़ी आते हैं, जबकि छोटे बच्चों के माता-पिता भोजन लेने आते हैं. आंगनबाड़ी स्तनपान कराने वाली माताओं को भी भोजन देती है.
लिज़ारानी ने अखबार से कहा, ‘बड़े बच्चे नहीं आ रहे हैं, और केवल दो अभिभावक ही राशन घर ले जा रहे हैं. यहां तक कि एक स्तनपान कराने वाली मां ने भी राशन लेना बंद कर दिया है.’
लिज़ारानी ने बताया कि उन्होंने और सरमिस्ता ने अभिभावकों को समझाने की कोशिश की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. उन्होंने कहा, ‘आख़िरकार मैंने उच्च अधिकारियों को लिखित शिकायत दी.’

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