
एक नहीं, इस्लाम में तलाक के हैं 5 तरीके... जानें मुस्लिम महिलाओं के पास कितना रहता है अधिकार
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Muslim Divorce : इस्लाम में कुल चार तरह के तलाक होते हैं. कुल तीन तरह से पति पत्नी को तलाक देता है, पत्नी को भी तलाक देने का हक है. लेकिन इन सब के बीच यह जानना जरूरी हो जाता है कि मुस्लिम महिलाओं को इस्लाम क्या अधिकार देता है.
सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई में इस प्रथा की कड़ी आलोचना की है. कोर्ट ने कहा कि क्या आधुनिक और सभ्य समाज में ऐसी भेदभावपूर्ण परंपराएं स्वीकार की जा सकती हैं? कोर्ट ने वकील या किसी तीसरे व्यक्ति के जरिए तलाक का नोटिस भेजने की प्रक्रिया पर भी कड़ा एतराज जताया और साफ कहा कि तलाकनामा पर पति के खुद के हस्ताक्षर होना जरूरी है.
पीठ ने सवाल किया कि पति अपनी पत्नी को तलाक देने के लिए खुद सामने क्यों नहीं आता? क्या पति इतना असंवेदनशील है कि वह अपनी पत्नी से सीधे बात करने तक को तैयार नहीं? कोर्ट ने कहा कि समाज अगर भेदभावपूर्ण प्रथाओं को बढ़ावा देगा, तो न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना ही पड़ेगा. ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि इस्लाम में तलाक की कौन-कौन सी प्रक्रियाएं हैं, तलाक-ए-हसन असल में क्या है, और मुस्लिम महिलाओं के हक क्या हैं.
मुस्लिम पर्सनल लॉ जिसे शरिया कहा जाता है, इसमें तलाक को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटा गया है. पहला पति द्वारा दिया जाने वाला तलाक और दूसरा पत्नी द्वारा लिया जाने वाला तलाक.
1. तलाक-अहसन: इसमें पति सिर्फ एक बार "तलाक" कहता है. पति के तलाक कहने के बाद पत्नी 3 माह की इद्दत में रहती है. इद्दत के दौरान पति चाहे तो तलाक वापस ले सकता है. सुलह की पूरी गुंजाइश रहती है, इसलिए यह सबसे आसान तरीका माना गया है.
इद्दत अरबी शब्द है, जिसका मतलब ‘गिनती’ होता है. इस्लामी कानून के तहत इद्दत एक जरूरी अवधारणा होती है. आमतौर पर यह इंतजार की अवधि होती है, जिसका पालन महिला अपने पति (शौहर) की मृत्यु या तलाक के बाद करती है. कुरान की आयतें (अल-बकरा 2:234:235) में भी इद्दत के महत्व पर जोर दिया गया है.
2. तलाक-ए-हसन: इसमें पति तीन महीनों में हर महीने एक बार “तलाक” कहता है. पहले और दूसरे महीने में सुलह हो जाए, तो तलाक की प्रक्रिया रुक जाती है. तीसरी बार तलाक बोलने पर तलाक अंतिम माना जाता है. सुप्रीम कोर्ट में यही प्रक्रिया फिलहाल विवाद में घिरी है.

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