
ईरान युद्ध: अमेरिका और यूरोप के बीच बना 'भरोसे का ब्रिज' तबाह!
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डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ जो जंग छेड़ी है, उसका साइड इफेक्ट अस्सी दशक पुरानी ट्रांस अटलांटिक साझेदारी पर दिखाई दिया है. ये पहली बार है जब यूरोपीय देशों ने अमेरिका को उसकी जंग में अकेला छोड़ दिया है.
दूसरे विश्वयुद्ध में हिटलर के खिलाफ अमेरिकी मदद का एहसान चुकाते आ रहे यूरोपीय देश अब थक चुके हैं. दशकों तक दुनिया ने एक ही तस्वीर देखी कि जब भी अमेरिका ने युद्ध का बिगुल फूंका, नाटो के नाम पर यूरोपीय देश उसके पीछे ढाल बनकर खड़े हो गए. चाहे 1990 का खाड़ी युद्ध हो, 2001 का अफगानिस्तान हमला, या 2003 का इराक आक्रमण. पश्चिमी दुनिया हमेशा एक 'ब्लॉक' की तरह दिखी. लेकिन ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका और इजरायल खुद को एक कूटनीतिक आईलैंड पर खड़ा पा रहे हैं.
यूरोपीय नेताओं का यह सामूहिक पीछे हटना महज एक इत्तेफाक नहीं है. यह 'फॉल्ट लाइन' (दरार) द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से धीरे-धीरे पक रही थी, जो अब ग्रीनलैंड विवाद और अमेरिका की 'एकला चलो' और 'अहं ब्रह्मास्मि' की नीति के कारण खुलकर सामने आ गई है.
सालभर पहले जब ट्रंप ने दूसरी बार अमेरिका का राष्ट्रपति पद संभाला तो उनके तेवर बदले हुए थे. वे गरज रहे थे कि अब यदि यूरोप को NATO में अमेरिका का साथ चाहिए तो अपनी जेब ढीली करनी होगी. वरना, अमेरिका अकेला काफी है दुनिया पर राज करने के लिए. यदि अमेरिका नाटो में है तो यूरोप को एहसान मानना चाहिए. वे बारी बारी से कई यूरोपीय देशों को अपने तेवर से बेइज्जत करते रहे. वेनेजुएला ऑपरेशन के बाद उनकी हिम्मत और बढ़ गई. टैरिफ पॉलिसी ने पहले ही यूरोप समेत पूरी दुनिया की इकोनॉमी को झकझोरा हुआ था. लेकिन जब ईरान युद्ध में ट्रंप की गणित गड़बड़ाया है तो यूरोपीय देश अमेरिका के बेलगाम नेतृत्व को उसकी हद बताने से गुरेज नहीं कर रहे हैं. इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 में हिस्सा लेने आए तीन बड़े यूरोपीय देशों जर्मनी, इटली और स्पेन के राजदूतों ने ईरान युद्ध को लेकर अपने अपने देशों की पॉजिशन स्पष्ट की. जिसे अमेरिका समर्थक तो कतई नहीं कहा जा सकता.
1. जर्मनी: "हमारा हाथ युद्ध में नहीं होगा"
जर्मनी के राजदूत डॉ. फिलिप एकरमैन ने इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 में जो कहा, वह बर्लिन की गहरी असुरक्षा को दर्शाता है. जर्मनी के लिए यह युद्ध 'अस्तित्व का संकट' है. उन्होंने स्पष्ट किया कि यह हमारा युद्ध नहीं है. हम में से कोई नहीं चाहता था कि ईरान के पास परमाणु हथियार हों. लेकिन, अभी ईरान में जो हो रहा है वो भी समझ से परे है.
जर्मनी की अर्थव्यवस्था पहले से ही ऊर्जा संकट से जूझ रही है. एकरमैन ने स्पष्ट किया कि ईरान के साथ युद्ध का मतलब है यूरोप के लिए एनर्जी सुसाइड. जर्मनी का मानना है कि अमेरिका ईरान में उलझकर रूस को खुला मैदान दे रहा है. एकरमैन ने सवाल उठाया कि जब हमारे दरवाजे पर (यूक्रेन में) युद्ध चल रहा है, तो हम एक नए युद्ध में क्यों कूदें?

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