
अविमुक्तेश्वरानंद एपिसोड ने संघ-बीजेपी को कैसे एक पीठ के रूप में स्थापित कर दिया
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माघ मेले में पालकी पर जाने से रोके गए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का धरना जारी है. तबीयत भी बिगड़ रही है, और विवाद थम नहीं रहा है. असल में, वो धर्म और राजनीति के घालमेल के शिकार हैं, और जब तक अपना स्टैंड पर फोकस नहीं करते ये सिलसिला चलता रहेगा.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती विवादों के केंद्र में हैं. पहले भी उनके साथ ऐसा होता रहा है. वाराणसी में पुलिस उन पर लाठियां बरसा चुकी है, और प्रयागराज प्रशासन उनके शंकराचार्य होने का ही सबूत मांग रहा है - और लड़ाई में एक बार फिर वो अकेले पड़ते दिखाई पड़ रहे हैं.
ऐसे दौर में जब राजनीति पर धर्म का खासा प्रभाव महसूस किया जाता है, अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती राजनीति के चक्रव्यूह में फंसते जा रहे हैं, और संत के वेष में उनको असुरों की संज्ञा दी जाने लगी है - लेकिन, ऐसी बातों के लिए कुछ हद तक वो खुद भी जिम्मेदार लगते हैं.
माघ मेले में दाखिल होने से रोक दिए जाने पर अविमुक्तेश्वरानंद धरने पर बैठे हैं, और हालत ये है कि उनके धरने को लेकर संत समाज भी बंटा हुआ है. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और जगद्गुरु रामभद्राचार्य आमने-सामने आ गए हैं, और एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं.
सबसे बड़ी मुश्किल तो ये है कि अविमुक्तेश्वरानंद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निशाने पर भी आ गए हैं - यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो बातों बातों में उनको रामायण के असुर किरदार ‘कालनेमि’ करार दे चुके हैं.
धरने का 5वां दिन, तबीयत बिगड़ी
18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती संगम में स्नान के लिए पहुंचे थे, लेकिन मेला प्रशासन ने पालकी पर सवार होकर जाने से रोक दिया. फिर पुलिस और उनके समर्थकों के बीच धक्का-मुक्की हुई, वो नाराज होकर धरने पर बैठ गए. धरने के पांचवें दिन अविमुक्तेश्वरानंद की तबीयत बिगड़ी हुई बताई जा रही है. उनके शिष्यों का कहना है कि वो सुबह से ही वैनिटी वैन से बाहर नहीं आए हैं. अंदर लेटे हैं, उन्हें तेज बुखार है. वसंत पंचमी पर भी उन्होंने संगम स्नान भी नहीं किया.

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