
अंधेरी कोठरी, जंजीरों से बंधे हाथ पांव और... भारत की पहली महिला जासूस ने क्या-क्या सहा?
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हमारे देश की पहली महिला जासूस ने अपनी जिंदगी में काफी कष्ट सहे. उन्होंने एक महान स्वतंत्रता सेनानी को बचाने के लिए अपने ही पति की हत्या तक कर दी थी.
आपने जासूसी की तमाम कहानियां सुनी होंगी, लेकिन इस कहानी को सुनने के बाद आप अवाक रह जाएंगे. ये कहानी उस महिला की है, जिसने देश के महान स्वतंत्रता सेनानी को बचाने के लिए अपने ही पति की हत्या कर दी थी. उसमें देशभक्ति इस कदर भरी हुई थी कि वो कुछ भी करने को तैयार थी. इससे भी बड़ी बात ये है कि उसे भारत की पहली महिला जासूस की उपाधि दी गई. उसने देश के लिए जो कष्ट सहे, उसके बारे में सुनकर किसी की भी आंखों से आंसू आ जाएं. आज भी लोग उसका पूरे दिल से सम्मान करते हैं. यहां हम जिसकी बात कर रहे हैं, उसका नाम नीरा आर्या है.
उनकी कहानी जानने के लिए आपको वक्त में पीछे जाना होगा, उतना पीछे जब भारत एक गुलाम देश था. अंग्रेज यहां के लोगों को प्रताड़ित कर रहे थे. भारत को लूटकर सारा खजाना ब्रिटेन पहुंचाया जा रहा था. गुलामी की इन्हीं जंजीरों को तोड़ने की कोशिश वो लोग कर रहे थे, जिनकी कुर्बानी के कारण ही आज हम खुली हवा में आजादी से सांस ले पा रहे हैं. नीरा आर्या भी देश को आजाद कराने के लिए वो सब कर रही थीं, जो उनके बस में था. उनका जन्म 5 मार्च 1902 को उत्तर प्रदेश के बागपत के खेखड़ा नगर के एक व्यापारी के घर हुआ था.
कोलकाता में हुई परवरिश
उनके पिता का कारोबार कोलकाता में फल फूल रहा था. इसी वजह से उनकी परवरिश भी कोलकाता में हुई. यहां उन्होंने बंगाली, संस्कृत और अंग्रेजी समेत तमाम भाषाएं सीखीं. उनके पिता अंग्रेजों से काफी प्रभावित थे. इसलिए उन्होंने अपनी बेटी की शादी अंग्रेज अफसर श्रीकांत जय रंजन दास से करा दी. वो ब्रिटिश भारत में सीआईडी इंस्पेक्टर था. इन दोनों के विचार बिलकुल मेल नहीं खाते थे. जहां नीरा देश को आजाद कराना चाहती थीं, वहीं दूसरी तरफ उनके पति अंग्रेजों के प्रति पूरी तरह वफादार थे.
एक रिपोर्ट के अनुसार, नीरा आर्या ने अपने लेख के एक अंश में लिखा था, 'मेरे साथ बर्मा की रहने वाली एक सरस्वती राजमणि नाम की लड़की थी. जो उम्र में मुझसे छोटी थी. हम दोनों ने ब्रिटिश अधिकारियों के घरों और सैन्य शिविरों में घुसने के लिए लड़कों की वेशभूषा अपनाई थी, ताकि हम जासूसी कर सकें. और नेताजी को जानकारी भेज सकें.'

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