
Ground Report: रियल लाइफ के डंकी! जेल, भूख, बर्फ, मौत... ड्रीम USA के लिए इन हरियाणवी छोरों को हर खतरा मंजूर!
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‘इक्वाडोर से असल सफर शुरू हुआ. जंगल, नदी, समंदर- सब नाप डाले. कई-कई दिन भूखे रहे. एक पूरा हफ्ता बिस्किट पर गुजारा. रास्ते में गुंडों ने कपड़े-जूते तक लूट लिए. ठंडे-खतरनाक मौसम में नंगे पांव हम बढ़ते रहे. बस, किसी भी तरह अमरीका जाना था. वहां पहुंचे भी, लेकिन 11 महीने कैंप में रखने के बाद डिपोर्ट कर दिए गए.’
जितेंद्र घुसपैठियों की जेल को अमेरिकी ढंग में कैंप कहते हैं. अमेरिका की दीवार लांघने का सफर उनकी सबसे खूबसूरत याद है. जेल के दिनों पर सवाल किया तो सिर झटकते हुए बोलते हैं- ‘वहां हरियाणवी से लेकर नेपाली और स्पेनिश लोग तक थे. सबके-सब खुश. वो जेल बेशक थी, लेकिन थी तो अमरीका में...’ जींद! हरियाणा का दिल कहलाते इस जिले में गांव के गांव सूने हो चुके. अमेरिका को 'अमरीका' बोलते गांववाले एक शब्द बखूबी जानते हैं- डंकी रूट. वो रास्ता, जिसमें अवैध तरीके से दूसरे देश में एंट्री होती है. जींदवाले इसके लिए लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं.
हर देश का अलग चार्ज. पुर्तगाल जाना है तो 15 लाख में काम हो जाएगा. जर्मनी के 25 लगेंगे. और अमेरिका के करीब 45 लाख.'सबको विदेश जाना है. पंजाब को चिट्टे (ड्रग्स) ने खा लिया और हरियाणा को अमेरिका का नशा लग चुका है' दुड़ाना गांव का एक शख्स कहता है.
करीब 65 साल के इस बुजुर्ग का बेटा महीनों बॉर्डर के आसपास भटकता रहा. बाद में किसी वीडियो में अधमरा दिखा, तब जाकर उसे रेस्क्यू किया जा सका.
दिल्ली से हरियाणा के हमारे सफर में ड्रीम USA की शुरुआत जींद शहर से ही हो गई.
ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों पर अमेरिका या कनाडा के स्टिकर लगे हुए. ये वे लोग हैं, जिनके परिवार से कोई न कोई इन देशों में बस चुका. अब वही देश इनकी पहचान हैं. चौराहों पर अंग्रेजी सिखाने या फिर वीजा कंसल्टेंसी देने वाले पोस्टर जगह-जगह लगे हुए. वैसे इम्तेहान देकर विदेश जाने का चलन हरियाणा में काफी कम है. यहां ज्यादातर लोग डंकी रूट पर ही भरोसा कर रहे हैं. क्यों? इसकी वजह देते हुए एक स्थानीय कहता है- अंग्रेजी में हमारे हाथ जरा तंग ही हैं, मेहनत चाहे जितनी करवा लो. अमेरिका को इसकी कद्र है. पैसे बढ़िया देगा. हारी-बीमारी में इलाज भी मिलेगा. यहां क्या है! धूल-धक्कड़ और फाका.यही बात मोरखी गांव के जितेंद्र भी कहते हैं. साल 2018 में उन्होंने डंकी के जरिए यूएसए पहुंचने की कोशिश की थी, लेकिन 11 महीने की कैद के बाद वापस लौटना पड़ा. वे याद करते हैं- खेत बेच-बूचकर हमने 40 लाख रुपये निकाले थे. इक्वाडोर से डंकी शुरू हो गया. हम दिन-दिनभर कभी बस, कभी टैक्सी में चलते. बीच में कई बार एजेंट हमें किसी होटल में टिकाकर चला जाता. एक बार 6 दिन तक हम कमरे में ही बंद रहे. वो रोटी दे जाता था, लेकिन बाहर निकलने की मनाही थी.
बोट से समंदर पार करना हो तो रात में निकलते. कई बार पुलिस पीछे लग जाती. तब चकमा देने के लिए छोटी सी किश्ती पूरी तेजी से यहां-वहां भागती. हमारी सांसें अटक जाती थीं. काली रात में विदेशी समंदर में डूब भी जाएं तो किसी को पता नहीं लगेगा. कई छोरे डर से ही खत्म हो गए. सबसे ज्यादा मुश्किल कब आई? एक बार जंगल में 7 दिनों तक फंसे रहे. वहां के जंगल यहां जैसे नहीं होते. लंबी-लंबी घास के बीच घने पेड़. दिन में भी अंधेरा छाया रहता. कभी भी बारिश होने लगती. शेर-भालू तो नहीं, लेकिन सांप-बिच्छू, जहरीली मकड़ियां खूब थीं. छू भी जाए तो शरीर पर जख्म हो जाए. लेकिन इससे भी ज्यादा खतरा हमें साथ वालों से था. हमारे ग्रुप में नेपाली और बांग्लादेशी मिलाकर कुल 32 लोग थे. डंकी सिस्टम अलग तरह से काम करता है. जैसे, शेयर्ड गाड़ी जब तक भरेगी नहीं, गाड़ी नहीं चलेगी. कुछ वही हिसाब होता है. 8 से 12 लोगों के जमा होने के बाद ही रवानगी होती है. एशिया के लोगों को एक रूट में डाल दिया. ज्यादातर लोग एक भाषा बोलने वाले, लेकिन इसके खतरे ज्यादा रहते हैं. लोगों में कंपीटिशन हो जाता है. जितने ज्यादा लोग अमेरिका तक जाएंगे, पेट्रोलिंग में फंसने के चांस उतने ज्यादा रहेंगे. ऐसे में लोग दूसरे देशों के लोगों की हिम्मत तोड़ने लगते ताकि वे रास्ते में ही हार जाएं. कई बार बात इससे भी आगे चली जाती है. चुप्पी… इससे भी आगे मतलब!

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