
4 साल के मासूम की डिब्बे में मिली थी लाश, 65 साल बाद हो सकी पहचान, क्या सुलझेगी ये मर्डर मिस्ट्री?
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कहानी उस मर्डर मिस्ट्री की जिसमें आरोपी तो दूर की बात, 65 साल तक पुलिस मृतक की ही पहचान नहीं कर पाई. पुलिस ने इस केस को सुलझाने के लिए काफी हाथ पैर मारे लेकिन हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी. फिर दिन आया दिसंबर 2022 का जब पुलिस ने डीएनए की एडवांस टेक्नीक जेनेटिक जिनियोलॉजी के जरिए मृतक की पहचान कर ली. अब उम्मीद जताई जा रही है कि शायद आरोपी का भी पता लगा लिया जाएगा.
बात है 20 फरवरी 1957 की. अमेरिका के पेंसिल्वेनिया राज्य में स्थित फिलाडेल्फिया (Philadelphia) के जंगलों में एक शिकारी को डिब्बा पड़ा मिला. शिकारी ने जब डिब्बा खोला तो उसके होश उड़ गए. इस डिब्बे में एक छोटे से बच्चे की लाश पड़ी हुई थी. उसने सोचा कि अगर वह पुलिस को इस बारे में बताता है तो वह उससे तरह-तरह के सवाल पूछेगी. वह पुलिस के लफड़े में नहीं पड़ना चाहता था. इसलिए वह डिब्बे को वैसा ही छोड़कर वहां से चला गया. फिर दिन आया 25 फरवरी 1957 का. यहां दो व्यक्ति जंगल से गुजर रहे थे तो उनकी भी नजर इस डिब्बे पर पड़ी.
उन्होंने देखा कि बच्चे का सिर और कंधा डिब्बे से बाहर था. जबकि, बाकी का शरीर डिब्बे के अंदर था. बच्चे को कंबल में लपेटकर डिब्बे के अंदर डाला हुआ था. वे लोग भी इसे नजरअंदाज करके वहां से निकल गए. लेकिन अगले दिन वे दोनों लोग रेडियो सुनते हुए फिर इसी रास्ते से गुजर रहे थे. तभी उन्होंने रेडियो में न्यूज सुनी कि एक 4 साल की बच्ची लापता हो गई है. उन्हें लगा कि शायद ये बच्ची यही हो. दोनों ने तुरंत पुलिस को फोन करके बताया कि यहां जंगल में भी एक बच्चे की लाश पड़ी है. उन्हें नहीं पता कि वह लड़की है या लड़का.
पुलिस उनके बताए पते पर पहुंची तो पाया कि लाश लड़की की नहीं. बल्कि, लड़के की है. अब यहां पुलिस के सामने नया मामला सामने आ गया कि आखिर ये बच्चा है कौन? 'The New York Times' के मुताबिक, पुलिस ने तुरंत इस नए मामले की भी जांच शुरू कर दी. उन्होंने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. लेकिन बच्चे की पहचान तो हुई नहीं थी. इसलिए इस अज्ञात बच्चे का नाम पुलिस ने जॉन डो रख दिया. ताकि इसी नाम से मामले की जांच को आगे बढ़ाया जा सके. वहीं, पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पता चला कि बच्चे की मौत ब्लंट फोर ट्रॉमा (Blunt For Trauma) की वजह से हुई थी.
बच्चे के सिर पर थे 4 घाव के निशान इसके सिर पर चार जख्म के निशान थे. दो निशान तो काफी पुराने थे. जबकि, दो निशान ताजा थे. इन दो ताजा घावों से पता लगा कि बच्चे के शरीर से पूरा खून ही निकाल लिया गया था. इसके अलावा पुराने घावों को देखकर लग रहा था कि बच्चे के साथ काफी समय से बर्बरता की जा रही थी. साथ ही यह भी पता चला कि बच्चा भूखमरी का भी शिकार हुआ था. उधर, जब पुलिस ने भी जंगल में जाकर सबूत जुटाने की भरपूर कोशिश की ताकि हत्या से जुड़ा कुछ तो सुराग उन्हें मिल पाए. लेकिन तमाम कोशिश के बावजूद पुलिस के हाथ कुछ भी नहीं लग पाया.
पुलिस नहीं कर पाई बच्चे की पहचान पुलिस और डॉक्टरों ने फिर शव को ध्यान से देखा तो पाया कि बच्चे के पांव काफी खुरदुरे हो गए थे. इस बात से डॉक्टरों ने अंदाजा लगाया कि मरने से पहले जरूर बच्चे को काफी समय तक पानी में डुबाकर रखा गया होगा. उसके शरीर में कुछ दाग-धब्बे में मिले. जांच की गई तो पचा लगा कि यह दाग उल्टी के हैं. लेकिन डॉक्टर हैरान थे कि जब बच्चे ने कुछ खाया ही नहीं था तो उसने उल्टी की कैसे. अब यहां पुलिस को पता लगाना था कि आखिर यह बच्चा था कौन. उन्होंने पूरा जोर लगा लिया लेकिन बच्चे की पहचान नहीं हो पाई. पुलिस ने इसके लिए रेडियो और टीवी में भी प्रसारण करवाया ताकि जिसका भी यह बच्चा हो वह न्यूज देखकर या सुनकर पुलिस से संपर्क करे. लेकिन यहां भी पुलिस को नाकामी हासिल हुई.
4 करोड़ से ज्यादा पैंपलेट्स बांटे गए पुलिस ने अब लोगों के घर-घर जाकर बच्चे की फोटो दिखाई. इसके बाद भी पुलिस पता नहीं लगा पाई कि यह बच्चा था कौन. यहां तक कि पुलिस ने पूरे अमेरिका में ही बच्चे को लेकर 4 करोड़ से ज्यादा पैंपलेट्स बांट दिए. लेकिन फिर से पुलिस के हाथ खाली ही रहे. जिसके बाद पुलिस ने इस बच्चे के हाथ और पैर के निशान लिए और कई अनाथ आश्रमों और अस्पतालों में भी जा-जाकर पता लगाने की कोशिश की कि कहीं यह बच्चा यहीं से ना भागा हो. दरअसल, अमेरिका में बच्चा पैदा होने के बाद वहां पहचान के लिए बच्चे के हाथ और पैर के निशान रख लिए जाते हैं. ताकि आगे जाकर उनकी पहचान इन्ही के जरिए की जा सके. लेकिन अफसोस इस बच्चे के हाथ और पैर के निशान कहीं भी रजिस्टर्ड नहीं थे. इससे अंदाजा लगाया गया कि बच्चा घर में ही पैदा हुआ और उसके घर वालों ने इसका रजिस्ट्रेशन भी नहीं करवाया. यहां अब यह केस इतना फेमस हो चुका था कि लोग इस बच्चे को 'The Boy In The Box' के नाम से जानने लगे.

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