
Ground Report: जंग की आफत के बीच बेरूत में मनी ईद... ऐसा था नजारा
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लेबनान की राजधानी बेरूत में जंग के बीच भी ईद का त्योहार मनाया गया, जहां ग्रैंड हरीरी मस्जिद में विभिन्न देशों के प्रवासी एक साथ नमाज अदा कर रहे थे. युद्ध की भयावहता के बावजूद, लोगों ने त्योहार की खुशियाँ साझा कीं और उम्मीद की किरण जिंदा रखी.
जंग जैसी आफत के बीच भी जिंदगी अपने रास्ते तलाश ही लेती है. लेबनान की राजधानी बेरूत आजकल इसी सच्चाई से रूबरू हो रहा है. एक तरफ ईद का मौका है जो खुशनुमा होना चाहिए था, लेकिन दूसरी तरफ जो जंग का माहौल बना हुआ है, उसकी वजह से त्योहार सिर्फ एक रस्म अदायगी की तरह अफरा-तफरी के बीच बीत रहा है. फिर भी त्योहारों की खास बात होती है कि वो जरा सी देर के लिए ही सही, जीना तो सिखा ही देते हैं तो यही नजारा बेरूत में दिखाई दिया.
शहर के सबसे सुरक्षित इलाके में है ग्रैंड हरीरी मस्जिद. ईद के मौके पर ये इबादत के लिए पहुंचे लोगों की भीड़ से गुलजार है. यह वही मस्जिद है, जिसे लेबनान के पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी ने बनवाया था और जो आज बेरूत के प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों में से एक है. समुद्र तट के करीब बनी इस भव्य मस्जिद के आसपास का इलाका ईद की रौनक से भरा हुआ है. लोग, जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से यहां काम करने आए हैं, एक साथ नमाज अदा करने के लिए जुटे हैं. इनमें अरब देशों के अलावा भारत, बांग्लादेश, अफ्रीकी देशों और हिंद महासागर क्षेत्र से आए प्रवासी भी शामिल हैं. अलग-अलग भाषाएं, अलग-अलग पहनावे, लेकिन भावना बस एक ही... ईद मुबारक
मस्जिद के बाहर खड़े बशीर से बात करने की कोशिश की. बशीर कुर्दिस्तान से हैं और अपने वतन के लिए जिंदाबाद-जिंदाबाद कहते हैं.उनकी आवाज अपने वतन के नाम के साथ गुरूर भरी हो जाती है, लेकिन उसके आसपास का माहौल इस बात का गवाह है कि वह फिलहाल एक ऐसे देश में है, जहां ली जा रही हर सांस जंग के माहौल में ली जा रही है.
थोड़ी दूरी पर एक और शख्स मिलता है, जो बांग्लादेश से आया है. वह बताता है कि वह यहां काम करता है और ईद के मौके पर नमाज अदा करने मस्जिद पहुंचा है. भाषा की सीमाएं हैं, लेकिन उसकी मुस्कान और आंखों की चमक साफ बताती है कि त्योहार का उत्साह हर जगह एक जैसा होता है. इस पूरे इलाके में एक अजीब सा विरोधाभास नजर आता है. एक ओर जंग की खबरें, तबाही और असुरक्षा का माहौल, तो दूसरी ओर यही लोग हैं जो ईद मना रहे हैं, एक-दूसरे से गले मिल रहे हैं, दुआएं दे रहे हैं.
मस्जिद के बाहर छोटे बच्चे खिलौनों के साथ नजर आ रहे हैं. भागता-दौड़ता ये मासूम बचपन सुकून दे रहा है. जंग की तबाह यादों को भुला देता है. ये सारे नजारे किसी सामान्य, शांत शहर में होने का अहसास कराते हैं, लेकिन हकीकत इससे ठीक उलट है. आज की ताऱीख में जंग सच है और वो हो रही है. लेकिन बेरूत के इस हिस्से में ईद की ये खुशी बताती है कि जंग के साए में भी उम्मीद जिंदा रहती है और जिंदगी, हर हाल में, चलती रहती है.

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