
हर पार्टी ने उठाया था अतीक अहमद के रुतबे का सियासी फायदा, बीजेपी पर भी हैं आरोप
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माफिया डॉन अतीक अहमद अपनी राजनीतिक करियर में पांच बार विधायक और एक बार सांसद रहा था. अतीक की पूर्वांचल में अल्पसंख्यक वोट पर अच्छी पकड़ थी. शायद यही वजह थी कि उसे राजनीतिक पार्टियों ने अपना मोहरा बनाया. उसने निर्दलीय विधायक के तौर पर राजनीति में कदम रखा था लेकिन बाद में सपा, अपना दल और कांग्रेस ने उसे फायदे के लिए इस्तेमाल किया. बीजेपी पर भी ऐसे ही आरोप लगते हैं.
माफिया से डॉन बना अतीक अहमद अब 'अतीत' हो गया है, लेकिन एक वक्त ऐसा भी था कि यूपी में उसकी तूती बोलती थी. उसने अपने आतंक से खूब पैसा और पावर कमाई और इसी की बदौलत राजनीति में आया. निर्दलीय के तौर पर एंट्री लेने वाले अतीक ने राजनीति में भी अपनी पकड़ मजबूत की फिर एक वक्त ऐसा भी आया कि राजनीति पार्टियों ने अपने फायदे के लिए उसका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. आइए अतीक के राजनीतिक सफर से जानते हैं कि किन-किन पार्टियों ने उसे मोहरा बनाकर अपनी चालें चलीं-
यह बात उस समय की है जब अतीक पर 'पावर' के साथ-साथ 'पद' पाने की सनक सवार हो गई थी. इसी का नतीजा था कि 1989 में वह पहली बार इलाहाबाद (पश्चिमी) विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा. इस चुनाव में उसे जीत मिली. उसने 25,906 वोट हासिल कर अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस प्रत्याशी गोपालदास को 8102 वोटों से मात दे दी. फिर 1991 का चुनाव आया. इस चुनाव में भी अतीक ने 36424 वोट पाकर बीजेपी उम्मीदवार रामचंद्र जायसवाल को 15743 वोटों से हरा दिया. इसके बाद 1993 में भी उसने बीजेपी उम्मीदवार तीरथराम कोहली को हरा दिया. उसने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लगातार तीन विधानसभा चुनावों में हैट्रिक मारकर सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया. ऐसा कहा जाता है कि अतीक को सपोर्ट देने के लिए इस दौरान सपा ने चुनाव मैदान में उसके खिलाफ कभी कोई उम्मीदवार नहीं उतारा.
इसके बाद यूपी में एक ऐसी घटना हुई, जो राजनीति के अध्याय में हमेशा के लिए जुड़ गई. इस घटना को गेस्ट कांड नाम दिया गया. सपा-बसपा गठबंधन टूटने के बाद 2 जून 1995 में बसपा सुप्रीमो मायावती पर लखनऊ के मीराबाई स्टेट गेस्ट हाउस में कुछ लोगों ने हमला कर दिया. इस कांड के मुख्य आरोपियों में एक अतीक अहमद भी था. इसी के बाद मुलायम सिंह यादव ने पहली बार अतीक अहमद के सिर पर हाथ रखा. 1996 में समाजवादी पार्टी ने अतीक अहमद को टिकट दे दिया. अतीक ने भी पहली बार किसी पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ा. इस चुनाव में उसके खिलाफ बीजेपी के तीरथराम कोहली मैदान में थे लेकिन अतीक ने यह चुनाव जीत लिया था.
इस दौरान अतीक अहमद की राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढ़ गई तो उसने सपा से लोकसभा चुनाव में टिकट की मांग की लेकिन बात बनने के बजाए उसका पार्टी से मनमुटाव हो गया. उसने 1999 में सपा का साथ छोड़कर सोने लाल पटेल की पार्टी अपना दल को जॉइन कर लिया. यह वह दौर था जब अतीक को पूर्वांचल में अल्पसंख्यक वोटरों में सेंध लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा था. अपना दल ने उसे प्रतापगढ़ से टिकट दिया लेकिन वह चुनाव हार गया लेकिन अतीक को खुश करने के लिए अपना दल ने उसे यूपी का अध्यक्ष बना दिया लेकिन 2002 में पार्टी ने उसे फिर टिकट दिया लेकिन इस बार वह चुनाव जीत गया. वह सपा उम्मीदवार गोपालदास यादव को हराकर पांचवीं बार विधायक बना था. ऐसा कहा जाता है कि डॉक्टर सोनेलाल ने अतीक को फ्री हैंड दे दिया था. समय के साथ अतीक की पूर्वांचल में होल्ड बढ़ती गई.
मुलायम सिंह यादव शायद अतीक अहमद के सपा में होने से पूर्वांचल के मुसलमानों में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अतीक की सपा में वापसी करवा ली. पार्टी ने उसे 2004 के लोकसभा चुनाव के लिए फूलपुर संसदीय क्षेत्र से टिकट दे दिया. अतीक यह चुनाव जीत गया. उसे अपनी इलाहाबाद पश्चिम सीट छोड़नी पड़ी. इसके बाद यहां उपचुनाव हुए. इस चुनाव में सपा ने अतीक को खुश करने के लिए उसके छोटे भाई अशरफ को टिकट दिया. हालांकि बसपा ने अशरफ के खिलाफ राजू पाल को उतार दिया. राजू पाल यह चुनाव जीतकर पहली बार विधायक बन गए. हालांकि साल भर के भीतर ही राजू पाल की हत्या कर दी. इस हत्या में अतीक और उसके छोटे भाई अशरफ को नामजद आरोपी बनाया गया.

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