
हमारी जंग नहीं, रसोई में आफत क्यों, ईरान-अमेरिका की जंग के बीच एनर्जी ट्रैप में कैसे फंसा भारत?
ABP News
Iran US Israel War: भारत में हर साल करीब 33-34 मिलियन टन एलपीजी की खपत होती है, जबकि पड़ोसी देश चीन हर साल करीब 100 मिलियन टन एलपीजी खर्च करता है.
अमेरिका और ईरान के बीच चल रही जंग से भले ही भारत का कोई भी सीधा वास्ता न हो, लेकिन इस जंग से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में हिंदुस्तान को भी शामिल होना ही पड़ा है. गैस की किल्लत की वजह से रसोई में सन्नाटा है. गैस एजेंसियों पर ग्राहकों की कतार है और ठेले-रेस्तरां पर ताले लटक रहे हैं. अमेरिका और ईरान के बीच की आग भारत के घरों तक पहुंच चुकी है, लेकिन सवाल है कि जब ये हमारी जंग नहीं है तो फिर आफत हमारी रसोई में क्यों है. आखिर क्यों हिंदुस्तान को अपनी जरूरत के तेल और गैस के लिए खाड़ी देशों पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है.
भारत में एलपीजी की खपत कितनी?
भारत में हर साल करीब 33-34 मिलियन टन एलपीजी की खपत होती है, जबकि पड़ोसी देश चीन हर साल करीब 100 मिलियन टन एलपीजी खर्च करता है. इस आंकड़े के साथ भारत चीन के बाद दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी खपत वाला देश है. इस पूरी खपत का करीब 60 फीसदी हिस्सा भारत को आयात करना पड़ता है जबकि बचा हुआ 40 फीसदी एलपीजी भारत की रिफाइनरियों में ही बना लिया जाता है. इसको जनवरी 2026 के एक आंकड़े से समझ सकते हैं. पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल यानी कि पीपीएसी का डाटा कहता है कि जनवरी 2026 में भारत में एलपीजी का कुल उत्पादन 1.158 मिलियन टन था जबकि जनवरी 2026 में ही भारत ने 2.192 मीलियन टन एलपीजी का आयात किया था. घरेलू उत्पादन यानी कि जो 40 फीसदी हिस्सा है, अभी उसपर असर नहीं है, लेकिन उसपर भी असर पड़ना तय है.
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