
सबूतों का अभाव, कबूलनामे पर उठे सवाल... मालेगांव केस के आरोपियों को बरी करते हुए कोर्ट ने क्या-क्या कहा?
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महाराष्ट्र के मालेगांव में 2008 में हुए विस्फोट मामले में 17 साल की लंबी सुनवाई के बाद मुंबई की विशेष एनआईए अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि
महाराष्ट्र के मालेगांव में 2007 में हुए बम धमाके के मामले में 17 साल बाद बड़ा फैसला आया है. मुंबई की एक विशेष अदालत ने कहा कि साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित समेत सभी सातों आरोपियों के खिलाफ सबूत नहीं मिले.
यह साबित नहीं हो सका कि बाइक साध्वी प्रज्ञा की थी और ना ही जांच एजेंसी सबूत दे पाई कि लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित ही RDX लाए थे. कोर्ट के फैसले के बाद बीजेपी-एनडीए ने कांग्रेस पर भगवा आतंकवाद की साजिश रचने का आरोप लगाया है..
2008 से 2025 तक चले मालेगांव ब्लास्ट केस की कहानी सिर्फ एक आतंकवादी हमले की नहीं, बल्कि भारतीय न्यायिक प्रक्रिया की लंबी, जटिल और कई बार बाधित होती गई यात्रा की भी है. इस दौरान केस पांच अलग-अलग विशेष जजों की अदालतों से होकर गुज़रा.
साध्वी प्रज्ञा के लिए कोर्ट ने क्या कहा विशेष न्यायाधीश ए.के. लाहोटी ने गुरुवार को अपने फैसले में कहा कि आरोपियों के खिलाफ भले ही "गंभीर संदेह" हो, लेकिन वह उन्हें दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है. इस फैसले के साथ ही "हिंदू या भगवा आतंकवाद" का वह कथित नैरेटिव भी कमजोर पड़ा, जिसे विपक्ष ने बीजेपी पर हमला करने के लिए 2008 की इस घटना के बाद उछाला था. महाराष्ट्र एंटी टेररिज्म स्क्वाड (ATS) ने अपनी जांच में दावा किया था कि धमाके में इस्तेमाल की गई एलएमएल फ्रीडम बाइक साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की थी.
एनआईए कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि यह साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं है कि बाइक वास्तव में प्रज्ञा ठाकुर की ही थी. कोर्ट ने कहा, “दोपहिया वाहन के चेसिस नंबर का पूरा विवरण फॉरेंसिक जांच में नहीं मिल पाया, इसलिए यह प्रमाणित नहीं किया जा सका कि वह बाइक वास्तव में उनकी थी.” कोर्ट ने यह भी माना कि साध्वी प्रज्ञा, जिन्हें नौ साल जेल में बिताने पड़े, धमाके से दो साल पहले ही सन्यास ले चुकी थीं और भौतिक वस्तुओं का त्याग कर चुकी थीं.
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