
संघ के 100 साल: संघ दफ्तर में जमीन पर बैठे 7 मुस्लिम देशों के राजदूत और हिन्दू धर्म पर गंभीर चर्चा!
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2002 का वह दिन था. पश्चिम एशिया के सात देशों के सात राजदूत दिल्ली में संघ के मुख्यालय 'केशव कुंज' में केएस सुदर्शन के साथ वार्त्तालाप करने के लिए उपस्थित थे. सभी राजदूत संघ प्रमुख केएस सुदर्शन की बातें सुनने के लिए दो घंटे तक जमीन पर बैठे रहे. इस चर्चा में के एस सुदर्शन ने भारत की हजारों वर्षों की समावेशी परंपरा से मुस्लिम देशों के राजदूतों को अवगत कराया. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
1964 का साल था, तब के सरसंघचालक गुरू गोलवलवकर एक कार्यकर्ता बैठक में भोपाल आए थे. इस बैठक में शामिल कार्यकर्ताओं से श्री गुरूजी ने दो व्यक्तियों का परिचय कराया था. इनमें एक थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय, और दूसरे का परिचय कराते हुए उन्होंने कहा था, ‘‘यह जो दुबला पतला लड़का माईक ठीक कर रहा है न, उसे माइक वाला मत समझ लेना, ये टेलीकम्युनिकेशन में इंजीनियर है और आज से आपका प्रांत प्रचारक है’’. माइक सुधारने वाले वे व्यक्ति थे के एस सुदर्शन, कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन इससे पूर्व वे महाकोशल प्रांत के प्रचारक थे. किसी को क्या पता था कि एक दिन ये टेलीकम्युनिकेशन का इंजीनियर वहां भी कम्युनिकेशन के तार जोड़ने में सफल होगा, जहां कोई टेलीकॉम टॉवर तक लगाने की अनुमति नहीं देता.
केएस सुदर्शन का तब के मैसूर राज्य के मांडया जिले में कुप्पहल्ली गांव से उनके परिवार का सम्बंध था, गांव का नाम वो अपने नाम में हमेशा साथ रखते थे, हालांकि उनका जन्म रायपुर में हुआ था. एक दिन वो संघ के पांचवे सरसंघचालक बने, तब उन्होंने उस कार्य का बीड़ा उठाया, जिसकी नींव कभी दूसरे सरसंघचालक गुरु गोलवलकर और तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने रखी थी. मुस्लिम और ईसाई समुदायों में संघ के काम का विस्तार करना.
बुधवार 2 अक्तूबर, 2002 का वह दिन था. पश्चिम एशिया के सात देशों के सात राजदूत दिल्ली में संघ के मुख्यालय 'केशव कुंज' में केएस सुदर्शन के साथ वार्त्तालाप करने के लिए उपस्थित थे. वे सभी राजदूत संघ प्रमुख केएस सुदर्शन की बातें सुनने के लिए दो घंटे तक जमीन पर बैठे रहे. उस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कोई दूसरा नहीं, बल्कि इराक के राजदूत सलेह मुख्तार कर रहे थे. इस बैठक में सीरिया, लीबिया, सूडान, ईरान तथा संयुक्त अरब अमीरात के राजदूत मौजूद थे. सऊदी अरब दूतावास के प्रथम श्रेणी सचिव भी उपस्थित थे. विश्व में हो रही घटनाएं तथा अरब राष्ट्रों में जो भी समस्याएं हैं, उस पर सुदर्शनजी के विचार सुनने में उनकी रुचि थी. केएस सुदर्शन ने भारत के वसुधैव कुटुम्बकम के मूल मंत्र से लेकर ये तक बताया कि कैसे हजारों साल से इस धरती पर भिन्न भिन्न मतों को मानने वाले लोग रहते आए हैं और फिर भी शांति बनी रही क्योंकि हिंदू स्वाभाविक रूप से धर्मनिरपेक्ष होता है. पूजा पद्धतियां अलग अलग हो सकती हैं, लेकिन यहां तो भगवान को न मानने वाले चार्वाक जैसे नास्तिक भी हिंदू ही माने जाते हैं.
उनका सीधा संदेश यही था कि इस भूमि की कुछ परम्पराएं, कुछ तौर-तरीके, कुछ मान्यताए हैं, उनका सम्मान होना ही चाहिए. उन्होंने अपने सम्बोधन में तमाम हिंदू प्राचीन ग्रंथों को उल्लेख किया और कहा कि यहां जितने भी शरणागत आए, उन्होंने यहां की परम्पराओं का सम्मान किया तो उनको यहां के लोगों ने कभी नुकसान नहीं पहुंचाया. हजारों सालों से यहूदी, पारसी यहां रहते आ रहे हैं. लेकिन हमलावर की तरह आना और फिर सैकड़ों साल बाद भी उन्हीं के जैसे तेवर रखना, उनपर गर्म करना भारत की आत्मा को कचोटता है. सभी समुदायों के लोगों को इसका ध्यान रखना होगा. उन्होंने अलग अलग क्षेत्र के उन भारतीय मुस्लिमों की भी मिसाल दी, जिन्होंने भारत को हृदय से अपनाया. उन्होंने भारत सरकार की वर्तमान 'सेक्युलर' नीति तथा भूमंडलीकरण के कारण प्राकृतिक एवं आर्थिक असंतुलन की स्थिति पैदा करनेवाले पाश्चात्य और नेतृत्व विषयों पर भी उन्होंने अपने विचार रखे. तब सीरिया के राजदूत ने मजाकिया अंदाज में कहा, 'सुदर्शनजी, आप इतना स्वादिष्ट (वैचारिक) भोजन नियमित रूप से इतने सारे लोगों को कैसे बाँटते हैं ?' इस पर लोगों का मुस्कराना स्वाभाविक था.
इस परिचर्चा के बाद इराक के राजदूत सलेह मुख्तार एक बार फिर 'केशव कुंज' में आए थे. यह फरवरी का तीसरा सप्ताह था, इराक पर अमेरिका के आक्रमण से ठीक एक महीने पहले. मुख्तार और केएस सुदर्शन ने व्यक्तिगत रूप से 45 मिनट तक आपस में बातचीत की. तब तक अमेरिका इराक पर हमला करने वाला है, यह सबको पता चल गया था. इसलिए यह स्पष्ट था कि बातचीत उसी दिशा में हुई होगी. हालांकि दोनों की बातचीत का ब्योरा कभी सामने नहीं आया, लेकिन बैठक के पश्चात् जब श्याम परांडे सलेह मुख्तार को उनकी कार तक छोड़ने गए तो उन्होंने सुदर्शनजी के कक्ष की ओर देखकर कहा, 'सचमुच, बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति हैं सुदर्शनजी', फिर श्याम परांडे से कहने लगे, 'आज तक जितने भी लोगों से मेरी भेंट हुई, सुदर्शनजी उनमें सबसे पवित्र व्यक्ति हैं'. इराक की हार के बाद सलेह मुख्तार ने किसी दूसरे देश में आश्रय ले लिया था. ये पूरी घटना श्याम परांडे ने ‘हमारे सुदर्शन (प्रभात प्रकाशन)’ के एक लेख में लिखी है.
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना

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