
जिंदगी के लिए नहीं, मौत के लिए AIIMS पहुंचा हरीश... अब बस इंतजार की घड़ी!
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गाजियाबाद के हरीश राणा की दर्दभरी कहानी इन दिनों चर्चा में है. सालों तक बिस्तर पर कोमा जैसी स्थिति में रहने के बाद अब उन्हें इच्छामृत्यु की प्रक्रिया से गुजारा जा रहा है.
गाजियाबाद के हरीश राणा की कहानी इन दिनों चर्चा में है. सालों तक कोमा जैसी अवस्था में जिंदगी बिताने के बाद अब उसे इच्छामृत्यु की प्रक्रिया से गुजारा जा रहा है. 11 साल पहले हरीश और उनके परिवार की जिंदगी पूरी तरह खुशहाल थी. हरीश का सपना इंजीनियर बनने का था. इसी ख्वाब को पूरा करने के लिए उन्होंने 2013 में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया. इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू हो चुकी थी और हरीश यूनिवर्सिटी के नजदीक मोहाली में एक पीजी में रहते थे. उनका कमरा चौथी मंजिल पर था. कॉलेज से लौटने के बाद एक दिन हरीश अपने पीजी की बालकनी पर खड़ा था और अचानक वहां से नीचे गिर गया. उसे तुरंत पीजीआई चंडीगढ़ ले जाया गया. सिर में गंभीर चोटें आई थी. सांसें चल रही थीं, लेकिन वह बेहोश था.
चूंकि यह मामला एक्सीडेंट का था, इसलिए मोहाली पुलिस ने एफआईआर दर्ज की.उस समय हरीश के घरवालों ने आरोप लगाया था कि उनके बेटे को जानबूझकर कुछ लड़कों ने बालकनी से नीचे गिराया.
चंडीगढ़ पीजीआई में हरीश की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था. डॉक्टरों ने अपने हाथ खड़े कर लिए थे. लेकिन माता-पिता ने हिम्मत नहीं हारी और हरीश को पीजीआई चंडीगढ़ से दिल्ली के एम्स ले आए. यहां भी लंबे समय तक इलाज चला, पर स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया.
एम्स के डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया. इसके बाद हरीश को दिल्ली के ही राम मनोहर लोहिया अस्पताल, फिर लोक नायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल और अंत में फोर्टिस अस्पताल में भर्ती कराया गया. लेकिन कहीं भी कोई फायदा नहीं हुआ.
हरीश के लिए घर तक बेचा
हरीश के इलाज के लिए परिवार ने सबकुछ दांव पर लगा दिया. उसके पिता अशोक राणा, जो एक कैटरिंग सर्विस कंपनी में नौकरी करते थे, मामूली तनख्वाह पर ही घर चला रहे थे. आमदनी का कोई दूसरा जरिया नहीं था और छोटा बेटा आशीष भी उस समय बहुत छोटा था. इसके बावजूद उन्होंने बेटे के इलाज के लिए अपनी पूरी जमा‑पूंजी खर्च कर दी।

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