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वो “तांत्रिक” जिसने रूस के अंतिम ज़ार को कठपुतली बना दिया

वो “तांत्रिक” जिसने रूस के अंतिम ज़ार को कठपुतली बना दिया

AajTak
Tuesday, March 07, 2023 06:38:48 AM UTC

कौन था रासपुतिन जो ज़ारशाही के अंतिम दौर में रूस को अपने इशारों पर नचा रहा था,रूस के अंतिम ज़ार और ज़ारीना पर उसने क्या जादू किया था? कैसे हुआ इस फरेबी साधु का अंत और उसके बाद रूसी साम्राज्य कैसे ढह गया?

रूसी राजमहल में एक बच्चा ज़ोर ज़ोर से रो रहा था. वो बीमार था.. बहुत बीमार. भले ही उसके मां बाप रूस के ज़ार और ज़ारीना थे मगर पैसा और ताकत कई बार बेबस हो जाते हैं. आज वैसा ही दिन था. बरसों की मनौतियों और पूजा पाठ के बाद पैदा हुए एलेक्सई की हालत अब किसी से देखी नहीं जा रही थी. उसे हीमोफीलिया था. इस बीमारी में खून के थक्के नहीं बनते. एक बार घाव हो गया तो फिर खून बहता रहता है. दुनिया भर के डॉक्टर्स के इलाज से बात नहीं बनी तो तय हुआ कि अब जादू की शरण ली जाए. धर्म की दुनिया उम्मीद देती है. वही उम्मीद शाही परिवार को भी थी. इस नाजुक वक्त में रूसी राजमहल तक एक संत एक जादूगर की ख्याति पहुंची जो लोगों की बीमारी ठीक कर देता था. रूस के राजमहल में साइबेरिया से आए एक ऐसे शख्स का प्रवेश हुआ जिसका दावा था वो सारी बीमारियां ठीक कर देता है. उसकी लम्बी बेतरतीब दाढ़ी, गन्दे कपड़े और डरावनी आंखें चुगली खाते थे उसके बेपरवाह और अजीब सा होने की. लेकिन आज राजमहल को इसकी चिंता नहीं थी. उन्हें अपना बच्चा स्वस्थ चाहिए था. ज़ार औऱ ज़ारीना उस अजीब से आदमी के पांवों में गिर गए. कृपा की भीख मांगने लगे. उस आदमी ने भी उन्हें निराश नहीं किया. भरोसा दिलाया कि ज़ार के वारिस को सिर्फ वही ठीक कर सकता है. हुआ भी वही. बच्चा ठीक होने लगा. ज़ार और ज़ारीना के लिए ये खुशी की बात थी लेकिन ये उनके साम्राज्य के पतन की शुरुआत भी थी. क्योंकि सन्त होने का दावा करने वाला ये शख़्स अगले कुछ बरसों में पूरे रूसी साम्राज्य को अपने इसी एहसान के दम पर नचाने वाला था. इस शख़्स का नाम था-रासपुतिन. ग्रिगोई रासपुतिन. रूसी इतिहास जिसे साधु कम एक खलनायक तांत्रिक के रूप में ज़्यादा जानता है.

इतिहास में ऐसे बहुत से मौक़े आए हैं जब शासक या सरकार एक मठ या साधु की शरण मे गए हैं. और ये शरण में जाने तक ही नहीं रुका है...आगे बढ़ने पर देश से जुड़े हुए फैसले भी उन्हीं दरबारों, मठों से हुए जिनका कथित तौर पर शासन से कोई सरोकार नहीं. रूस में ये वक्त कम्युनिस्ट क्रांति के ठीक पहले का था. ज़ारशाही अपने अंतिम दिन गिन रही थी.. लेकिन ज़ार इसका अनुमान लगा नहीं पा रहे थे. उसी समय रूस के ठंडे और सूखे प्रांत साइबेरिया में जन्मा एक किसान का बेटा जो ख़ुद को साधु कहता था, चमत्कारी होने का दावा करता था- रूसी राजपरिवार के वो इतने क़रीब आ गया कि उसके इशारे पर रूस का राजदरबार चलने लगा. 1869 के दिनों में रूस का केंद्र मास्को नहीं सेंट पीटर्सबर्ग था. यहाँ से क़रीब ढाई हज़ार किलोमीटर दूर टूरा नदी किनारे ग्रिगोई जन्मा था, जो बाद में रासपुतिन कहलाया. माता-पिता साधारण किसान. साइबेरिया जगह भी साधारण, इतनी कि रूस में होने के बावजूद राजधानी की हलचल तक से वाकिफ नहीं. ग्रिगोई अपनी माता-पिता की कई संतानों की मृत्यु के बाद जन्मा था. पढ़ाई में कोई खास दिलचस्पी नहीं. शायद यही वजह थी कि वो औसत विद्यार्थी भी ना बन सका. शुरूआत में ग्रिगोई बस शऱाब पीकर यहां वहां भटकता रहता था मगर जाने क्यों उसे मठों ने आकर्षित कर लिया. 18 साल की उम्र में एक मठ उसने जॉइन भी कर लिया. अपना नाम रासपुतिन रख लिया. कुछ दिन तक सब ठीकठाक चलता रहा पर नियम कायदों से ग्रिगोई रासपुतिन को चिढ़ थी. एक दिन अचानक उसने गांव लौटने का फैसला कर लिया. सुनिए पूरा पॉडकास्ट

रासपूतिन को धर्म की दुनिया लुभाती थी लेकिन त्याग का कोई स्थान नहीं था. महज एक बरस मठ में बिता कर उसने शादी कर ली. बच्चे हुए मगर रासपुतिन का मन कहीं टिकता कहां था. एक दिन वो झोला उठाकर सैर पर निकल गया. कई देश घूमते घूमते रासपुतिन का हुलिया बदलने लगा. वो लंबा लबादा ओढ़े चलता रहता. महीनों तक नहाता नहीं था जिससे उसके शरीर से बकरियों जैसी बू आने लगी. दाढ़ी बेतरतीब हो गई और उसमें अक्सर खाने के दाने चिपके रहते. वो दावा करता कि उसके पास दैवीय शक्तियां हैं. वो किसी भी बीमारी पर काबू पा सकता है. इतिहासकार बताते हैं कि ऐसे वाकये हुए भी जब उसने किसी को राहत दे दी. इन घटनाओं ने तेज़ी से असर किया. बड़ी बड़ी सम्मोहक आंखों वाले रासपुतिन से लोग खौफ खाने लगे. वो कहने लगा था कि उसे भविष्य दिखता है. राजपरिवार के संपर्क में आने से पहले ही रासपुतिन की पहुंच रूस के एलीट वर्ग में हो चुकी थी. एक साधु के तौर पर उसकी चर्चा को महल तक पहुंचने में फिर वक्त नहीं लगा. अपने बच्चे की बीमारी से परेशान ज़ार निकोलस सेकेंड और उनकी बीवी महारानी एलेक्ज़ेंड्रा सब कुछ आज़मा लेना चाहते थे. शायद 1905 सबसे मुफीद वक्त था रासपुतिन के आने का.

सुनिए पूरा पॉडकास्ट

रासपुतिन एक बार महल में घुसा तो फिर वहीं टिक गया. उसने महारानी को भरोसा दिला दिया कि यदि वो गया तो उनका बेटा मर जाएगा. उसे राजपरिवार के इतना करीब देख बाकी लोगों ने भी उससे करीबियां बढ़ा लीं. राजमहल में तो वो सभ्यता से पेश आता मगर बाहर उसकी अय्याशियां बढ़ने लगीं. प्रभाव ने पैसा दिलाया तो अपने आसपास उसने एक सेक्सुअल कल्ट फॉलोइंग पैदा कर ली. महंगी पार्टियां देना उसका रोज़ का काम था. इन्हें वो पार्टी नहीं कहता था बल्कि ये धार्मिक संस्कार के रूप में होता था. यहां वो रोमानोव साम्राज्य में रहनेवाले अमीरों और मंत्रियों से मिलता था. उन्हें लुभाता था. उसका प्रभाव सबसे ज़्यादा ज़ारीन एलेक्ज़ेंड्रा पर था जो इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया की ग्रैंड डॉटर थीं. इस परिवार में हीमोफीलिया की बीमारी चली आ रही थी और यही राजकुमार एलेक्सेई तक पहुंची थी. एलेक्ज़ेंड्रा को रूसी जनता खास पसंद नहीं करती थी. वो खुद भी रूसी कल्चर, खानपान, नाच गाने को मंज़ूर नहीं कर सकी थीं. शुरूआत में चार बेटियां पैदा करने के चलते भी रूसी उससे खफा थे. उन्हें लगता था कि ज़ारीन रोमानोव वंश को उत्तराधिकारी नहीं दे सकेगी. यही वजह थीं कि उसके आसपास उसका भला चाहनेवाले बहुत कम थे और ये बात खुद ज़ारीना जानती थीं. रासपुतिन के लिए करीबी बढ़ाने का इससे बढ़िया मौका क्या हो सकता था... और अब तो ज़ार की कमज़ोर नस भी इसके हाथ मे थी. ज़ार और ज़ारीना बेटे का हीमोफिलिया ठीक कराने के लिए कुछ भी कर सकते थे. इसी फेर में वो जादू टोने की ज़द में आ गए. रासपुतिन के पहले वो वैशोट नाम के तांत्रिक के पैर पड़ते थे जब तक कि उसकी पोल नहीं खुल गई और उसे देश निकाला नहीं मिल गया. अब इस जोड़े को रासपुतिन मिल चुका था. सुबह से रात तक भोग विलास में डूबे रासपुतिन के सेक्स और सनक के किस्से पूरे रूस में फैलने लगे. उसकी शिकायत दरबार तक गई मगर ज़ारीना उसकी ढाल बनी खड़ी थी. इस बात को कई एरिस्टोक्रेट महसूस कर रहे थे कि ज़ारीना पर रासपुतिन का प्रभाव कुछ ज़्यादा ही है. डगलस स्मिथ अपनी किताब रासपुतिन द ऑटोबायोग्राफी में लिखते हैं कि बहुत ही कम समय मे उसकी महत्वाकांक्षा धार्मिक चमत्कार से हट कर प्रशासन तक आ पहुंची. वो प्रधानमंत्री बनने के भी सपने पालने लगा. यही वो समय था जब रासपुतिन को महल से निकाला भी गया लेकिन बहुत ज़्यादा देर तक नहीं. कहा जाता है कि रासपुतिन इतना बड़बोला था कि ज़ारीना से अपने अवैध संबंधों तक की डींग हांकता.सुनिए पूरा पॉडकास्ट

बीसवीं सदी दस्तक दे रही थी. रूस विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ा था. ज़ार को अपने सेनाओं का साथ देने राजधानी छोड़नी पड़ी और पीछे रह गए ज़ारीना और रासपुतिन. रासपुतिन अब इतना खुल गया कि खुले आम उस पर रिश्वत लेने और बलात्कार करने तक के आरोप लगने लगे.उसके प्रभाव का अंदाज़ा लगाइए कि विश्वयुद्ध में फ्रंटलाइन से दूर रखने के लिए वो सिपाहियों से रिश्वत लेने लगा. एक बार रासपुतिन ने इच्छा जताई कि वो फ्रंट पर जाकर सिपाहियों को आर्शीवाद देना चाहता है को इसका विरोध कमांडर इन चीफ ग्रैंड ड्यूक निकोलस ने किया. इसके बाद रासपुतिन ने भविष्यवाणी कर दी कि अगर खुद ज़ार ने सेना की कमान नहीं संभाली तो रूस हारेगा. ये झूठ था लेकिन देवताओं से डरनेवाले ज़ार ने ड्यूक को पद से हटाकर खुद सेना को संभाला. इस तरह रासपुतिन ने ड्यूक को सबक भी सिखाया और ज़ार को राजधानी से दूर भी किया. रासपुतिन की निरंकुशता से रूस के लोग नाराज़ थे तो एलीट्स ईर्ष्यालु. वो खुल कर चर्च से नाइत्तेफाकी रखता था सो वहां भी उसके दुश्मन ठीकठाक बढ़ चुके थे. बहुत से लोग उसकी हत्या की साज़िश रच रहे थे मगर जाने क्यों इस बात का सभी को खौफ था कि वो मारने से मरेगा भी नहीं. इसकी वजह थी उसकी हत्या की कोशिशों का नाकाम होते जाना. आखिरकार रासपुतिन से नाराज़ रूसी संसद ड्यूमा के एक सांसद ने खुलेआम उसकी आलोचना कर डाली. इसके तुरंत बाद ज़ार की भतीजी के पति फेलिक्स यूसोपोव ने तय कर लिया कि अब रासपुतिन को ठिकाने लगाना होगा. सुनिए पूरा पॉडकास्ट

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