
‘विवादों के शंकराचार्य‘... एक विशुद्ध धार्मिक पदवी कैसे फंसती चली गई राजनीति में
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आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने चार शंकराचार्य पीठों की स्थापना की. उद्देश्य था हिंदू धर्म और दर्शन को बचाना और आगे बढ़ाना. ऐसा हुआ भी. लेकिन पिछली एक सदी में कई और शंकराचार्य पीठ गढ़ ली गईं. इन पर बैठने वालों में कलह आम हुई. चुनावी लाभ, उत्तराधिकार का झगड़ा, राजनीतिक हस्तक्षेप, और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं ने इस पद को धार्मिक से ज्यादा राजनीतिक बना दिया है.
हिंदू धर्म में शंकराचार्य का पद आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख पीठों (ज्योतिर्मठ, द्वारका, पुरी और शृंगेरी) के प्रमुखों का है, जो अद्वैत वेदांत और सनातन धर्म के संरक्षक माने जाते हैं. हालांकि यह पद मुख्य रूप से धार्मिक है, लेकिन आधुनिक भारत में यह बार-बार राजनीतिक विवादों का केंद्र बनता रहा है. इन विवादों में उत्तराधिकार झगड़े, धार्मिक बयानों का राजनीतिक उपयोग, सरकारी हस्तक्षेप और राजनीतिक दलों (जैसे BJP, कांग्रेस) से जुड़ाव प्रमुख हैं. ये विवाद धार्मिक स्वायत्तता बनाम राजनीतिक प्रभाव के सवाल उठाते हैं. हिंदू धर्म की सबसे बड़ी पदवी को हासिल करने और उसे बचाए रखने के नाम पर शंकराचार्य पद राजनीतिक साजिश, बदले की कार्रवाई के लिए राजनेताओं के साथ देते और लेते रहे हैं . राजनेताओं ने उसके बदले अपने वोट बैंक में बढ़ोतरी की चाह रखी है. आइये देखते हैं कि शंकराचार्य का पद कब कब राजनीतिक मुद्दे में बदल गया. और ऐसे कौन से कारण रहे हैं जिसके चलते संतों को राजनीतिज्ञों को जरूरत पड़ने लगी.
1-ज्योतिर्मठ पीठ पर बैठे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का माघ मेला विवाद
सबसे पहले ताजे विवाद से शुरू करते हैं. जो शंकराचार्य पद को राजनीतिक हथियार बनाने का उदाहरण है. 18-19 जनवरी 2026 को प्रयागराज माघ मेला में मौनी अमावस्या पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को त्रिवेणी संगम में राजकीय स्नान (पालकी में जाने) से रोका गया. पुलिस ने भीड़ और अनुमति का हवाला दिया, लेकिन उनके शिष्यों के साथ झड़प हो गई.
जाहिर है कि विवाद बढने पर मेला प्रशासन ने 20 जनवरी को 24 घंटे का नोटिस जारी किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के 2022 आदेश का हवाला देकर पूछा कि वे 'शंकराचार्य' टाइटल कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं (क्योंकि उत्तराधिकार मामला कोर्ट में है). स्वामी ने अनशन शुरू कर दिया और चैलेंज किया कि न मुख्यमंत्री, न राष्ट्रपति शंकराचार्य तय कर सकते हैं. इसके बाद मामले को लेकर राजनीति शुरू हो गई. कांग्रेस उत्तर प्रदेश सरकार पर हमलावर हो गई. पार्टी ने इसे BJP का धर्मद्रोह और साधुओं का अपमान करना बताया. कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि स्वामी को निशाना बनाया गया क्योंकि उन्होंने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा, केदारनाथ में '228 किलो सोने की चोरी' और COVID में गंगा में शवों पर सवाल उठाए थे.
BJP ने इसे प्रशासनिक मुद्दा कहा, लेकिन स्वामी के समर्थकों ने इसे राजनीतिक साजिश बताया. दिलचस्प यह है कि 2023 में इन्हीं शंकराचार्य ने राहुल गांधी को 'मनुस्मृति अपमान' पर हिंदू धर्म से बहिष्कृत किया था. लेकिन अब कांग्रेस उनका समर्थन कर रही है. यह राजनीतिक अवसरवाद का चरम बिंदु है.
2- राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा विवाद (2024)

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