
युद्ध के दौरान ब्लैकआउट क्या होता है? गाड़ियों की लाइट पर काले रंग से लेकर घर की बत्ती तक लागू होते हैं ये नियम
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ब्लैकआउट युद्ध के दौरान एक महत्वपूर्ण रणनीति है जो दुश्मन के हमलों को मुश्किल बनाता है. हालांकि इसने नागरिक जीवन को जटिल बनाया. सड़क दुर्घटनाओं को बढ़ाया. ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में लागू सख्त नियमों, जैसे खिड़कियों को ढंकना, वाहनों की हेडलाइट्स पर मास्क लगाना और गति सीमा ने युद्ध के समय की चुनौतियों को उजागर किया.
युद्ध के समय ब्लैकआउट एक ऐसी रणनीति है, जिसमें कृत्रिम रोशनी को न्यूनतम किया जाता है. ताकि दुश्मन के विमानों या पनडुब्बियों को निशाना ढूंढने में कठिनाई हो. यह प्रथा मुख्य रूप से 20वीं सदी में द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के दौरान प्रचलित थी.
ब्लैकआउट नियम घरों, कारखानों, दुकानों और वाहनों की रोशनी को नियंत्रित करते थे, जिसमें खिड़कियों को ढंकना, स्ट्रीट लाइट्स बंद करना. वाहनों की हेडलाइट्स पर काला रंग या मास्क लगाना शामिल था.
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ब्लैकआउट का उद्देश्य
ब्लैकआउट का मुख्य उद्देश्य दुश्मन के हवाई हमलों को मुश्किल बनाना था. रात के समय शहरों की रोशनी दुश्मन के पायलटों के लिए निशाना ढूंढने में सहायक होती थी. उदाहरण के लिए, 1940 के लंदन ब्लिट्ज के दौरान, जर्मन लूफ्टवाफे ने ब्रिटिश शहरों पर रात में बमबारी की. रोशनी को कम करके नेविगेशन और टारगेटिंग को जटिल किया गया. तटीय क्षेत्रों में ब्लैकआउट जहाजों को दुश्मन की पनडुब्बियों से बचाने में मदद करता था, जो तट की रोशनी के खिलाफ जहाजों की सिल्हूट देखकर हमला करते थे.

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