
महाराष्ट्र निकाय चुनाव तक 'दोस्ती' बनी रहे! महायुति के दलों के समझौते की इनसाइड स्टोरी
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महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे ने निकाय चुनाव को लेकर कहा है कि हम लोकल और सीनियर, हर लेवल पर महायुति के रूप में चुनाव लड़ेंगे. हमने पिछले साढ़े तीन साल में कई विकास कार्य किए हैं. इन्हें जनता देख रही है और हम इस चुनाव में विकास और प्रगति के अपने एजेंडे पर ही उतरेंगे.
भारतीय जनता पार्टी और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने अपने हालिया मतभेदों को सुलझा दिया है और महाराष्ट्र में आगामी 29 दिसंबर को होने वाले नगर निगम चुनाव में अधिकांश सीटों पर महायुति गठबंधन के रूप में एक साथ लड़ने का औपचारिक समझौता कर लिया है.
यह फैसला कई उच्चस्तरीय बैठकों के बाद लिया गया है, जिनमें एक बैठक बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के बीच हुई तो एक बैठक रविंद्र चव्हाण और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ हुई.
इन बैठकों का मुख्य परिणाम यह है कि दोनों दलों के स्थानीय पदाधिकारियों की एक संयुक्त समिति गठित की गई है. यह समिति तुरंत मुंबई, ठाणे, पुणे और नासिक जैसे बड़े नगर निगमों के लिए स्थानीय स्तर पर सीट-बंटवारे का फॉर्मूला तय करना शुरू कर देगी. कल्याण-डोंबिवली और नवी मुंबई में चल रहे विवादों को प्राथमिकता दी जाएगी.
बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने गठबंधन की अनिवार्यता की पुष्टि करते हुए कहा कि मुंबई और अन्य प्रमुख नगर निगमों में गठबंधन जरूरी है, इस पर हाईकमान पूरी तरह दृढ़ है. शिंदे गुट की शिवसेना को फिर से साथ लाने का रणनीतिक फैसला कई कारणों से लिया गया है:
बीजेपी के एक आंतरिक सर्वे से पता चला है कि मुंबई में कई मुस्लिम-बहुल वॉर्डों (18 वॉर्डों में 70 फीसदी तक) में बीजेपी को कड़ा विरोध झेलना पड़ रहा है, लेकिन एकनाथ शिंदे के उम्मीदवारों को वहां अच्छा समर्थन मिल रहा है.
सर्वे के अनुसार, यदि शिंदे गुट इन इलाकों में अपने उम्मीदवार उतारता है, खासकर लाड़ली बहना योजना का मुस्लिम महिलाओं में प्रभाव होने के कारण तो गठबंधन को बहुत बड़ा फायदा होगा. इसके अलावा बीजेपी यह अच्छी तरह समझती है कि हाल के विधान परिषद चुनावों में दोनों दलों ने अलग-अलग लड़ाई लड़ी थी. अगर अब नगर निगम चुनावों में भी शिंदे सेना को अकेले लड़ने दिया गया, तो बड़े शहरों में उसका तेजी से विस्तार हो जाएगा. उन्हें साथ रखना इसलिए जरूरी समझा गया ताकि उनका विस्तार रोका जा सके, हिंदुत्व वोटों का बंटवारा न हो और सबसे महत्वपूर्ण- मुंबई को उद्धव ठाकरे गुट के हाथों जाने से बचाया जा सके.

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