
मंदिरों में VIP दर्शन और भेदभाव खत्म करने की मांग... याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 27 जनवरी को करेगा सुनवाई
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याचिका में तर्क दिया गया है कि मंदिरों में विशेष या जल्दी 'दर्शन' के लिए अतिरिक्त 'वीआईपी दर्शन शुल्क' वसूलना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है. क्योंकि इस व्यवस्था से उन भक्तों के साथ भेदभाव होता है जो ऐसे शुल्क नहीं दे सकते.
देवस्थान, धाम या मशहूर मंदिरों में देवी देवताओं के सशुल्क वीआईपी दर्शन की व्यवस्था खत्म करने की मांग वाली अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट जनवरी 2025 में सुनवाई करेगा. चीफ जस्टिस खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ के समक्ष ये रिट याचिका सुनवाई के लिए लगी थी. उसमें देशभर के मंदिरों में वीआईपी दर्शन शुल्क समाप्त करने की मांग की गई है. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पिछली सुनवाई की गलत मीडिया रिपोर्टिंग पर आपत्ति जताते हुए सीजेआई जस्टिस खन्ना ने कहा कि अदालत में जो कुछ हुआ, उसे मीडिया ने पूरी तरह से गलत तरीके रिपोर्ट किया.
कोर्ट ने गलत रिपोर्ट पर जताई आपत्ति वकील ने अदालत से कहा कि 'मुझे इसकी जानकारी नहीं है. उन्होंने इसे अपने तरीके और नजरिए से प्रस्तुत किया होगा.' जस्टिस संजय कुमार ने कहा कि यह पूरे देश में हो रहा है. इस पर वकील ने कहा कि मैंने मीडिया में ऐसा कुछ नहीं कहा. मैंने तो इसे अखबार में ही पढ़ा है. जस्टिस कुमार ने कहा कि 'साफ है कि आपने मीडिया से बात की होगी. अदालत में क्या हो रहा है, इसकी जानकारी मीडिया को कैसे मिलेगी? सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस की किसी टिप्पणी को आपने बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया होगा.'
27 जनवरी 2025 को होगी अगली सुनवाई वकील ने इसके जवाब में कहा कि, 'कोर्ट में क्या हो रहा है, इसका ब्यौरा रखने के लिए नियमित रूप से ट्रैक रखने वाले संवाददाता होते हैं.' सीजेआई ने कहा कि सुनवाई के दौरान हम कभी-कभी कुछ सवाल पूछते हैं. आप उसे गलत दिशा में ले जाते हैं. यह कहते हुए कि मेरी ऐसी या वैसी कोई दलील या मांग या आग्रह नहीं है. फिर इन सब चीजों को अपने ढंग से मीडिया को ब्रीफ किया जाता है. अब इस मामले की अगली सुनवाई 27 जनवरी 2025 को होगी.
VIP दर्शन अन्य भक्तों के साथ भेदभाव याचिका में तर्क दिया गया है कि मंदिरों में विशेष या जल्दी 'दर्शन' के लिए अतिरिक्त 'वीआईपी दर्शन शुल्क' वसूलना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है. क्योंकि इस व्यवस्था से उन भक्तों के साथ भेदभाव होता है जो ऐसे शुल्क नहीं दे सकते. याचिका में कहा गया है कि 400-500 रुपये तक का अतिरिक्त शुल्क लेकर मंदिरों में देवताओं के विग्रह के अधिकतम निकटता तक जल्दी पहुंचा जा सकता है. ये व्यवस्था उन साधारण भक्तों के प्रति असंवेदनशील है, जो शारीरिक और आर्थिक बाधाओं का सामना करते हैं.
क्योंकि वो 'वीआईपी प्रवेश शुल्क' देने में असमर्थ हैं. विशेष रूप से, इन वंचित भक्तों में महिलाएं, दिव्यांग और वरिष्ठ नागरिक अधिक बाधाओं का सामना करते हैं. याचिकाकर्ता ने गृह मंत्रालय को इस समस्या के समाधान के लिए कई बार अनुरोध किया है, लेकिन केवल आंध्र प्रदेश राज्य को निर्देश जारी किए गए. जबकि उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे अन्य कई राज्यों को छोड़ दिया गया.
याचिका में इन चार खास बिंदुओं पर राहत की गुहार लगाई गई है.

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