
'भेदभावपूर्ण है यह फैसला...', उमर और शरजील की जमानत खारिज होने पर वरिष्ठ वकीलों ने उठाए सवाल
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उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज होने पर प्रशांत भूषण और कपिल सिब्बल जैसे वकीलों ने इसे अन्यायपूर्ण बताया है. समर्थकों का तर्क है कि बिना सबूत और बिना ट्रायल के पांच साल की कैद मानवाधिकारों का उल्लंघन है और यह फैसला लोकतांत्रिक असहमति को दबाने जैसा है.
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली हिंसा की कथित साजिश से जुड़े मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया. जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने साफ कहा कि इन दोनों आरोपियों की भूमिका अन्य सह-आरोपियों से अलग और अधिक गंभीर है, इसलिए सभी को एक ही पैमाने पर नहीं तौला जा सकता.
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कुछ आरोपियों पर प्रत्यक्ष हिंसा में शामिल होने के आरोप हैं, जबकि कुछ पर हिंसा को बढ़ावा देने और साजिश रचने के आरोप हैं. ऐसे में उमर खालिद और शरजील इमाम की तुलना उन आरोपियों से नहीं की जा सकती जिन्हें जमानत दी गई है.
उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देश की राजनीति और कानूनी हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. कई वरिष्ठ वकीलों, सांसदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस फैसले को अन्यायपूर्ण और भेदभावपूर्ण बताया है.
वकीलों ने उठाए फैसले पर सवाल
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने इस फैसले को "चौंकाने वाला और अन्यायपूर्ण" करार देते हुए कहा कि जिन लोगों पर हिंसा का कोई सीधा आरोप नहीं है, उन्हें सिर्फ 'सुरक्षित गवाहों' के गुप्त बयानों के आधार पर 5 साल से जेल में रखना जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का मज़ाक है. प्रशांत भूषण ने कहा, 'उमर खालिद और शरजील इमाम पर खुद हिंसा करने का आरोप नहीं है, बल्कि साजिश का आरोप है. उनके भाषणों के कई वीडियो मौजूद हैं जिनमें वे हिंसा के खिलाफ बोलते हैं.'
वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कोर्ट के रुख को 'भेदभावपूर्ण और कानूनी रूप से अनुचित' बताया. उन्होंने कहा, 'जिन आरोपियों को जमानत से वंचित किया गया है, वही इस आदेश का असली संकेत है. यह भेदभावपूर्ण है और कानूनी तौर पर न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है.'

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