
भारत के लिए क्या चीन के खिलाफ जाएगा रूस? जानें क्या कह रहे एक्सपर्ट्स
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिवसीय रूस दौरे पर हैं. पीएम मोदी के इस दौरे को बदलते वैश्विक परिदृश्य में बेहद ही अहम माना जा रहा है. यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद उनका यह पहला रूस दौरा है जो रूस-चीन रिश्तों के लेंस से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
तीसरी बार सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पहले विदेश दौरे में रूस की यात्रा पर हैं. यूक्रेन के साथ युद्ध शुरू होने के बाद से पीएम मोदी का यह पहला रूस दौरा है जिसमें वो 22वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे. प्रधानमंत्री मोदी का रूस दौरा तीन सालों के अंतराल के बाद ऐसे वक्त में हो रहा है जब अमेरिका समेत पश्चिमी देशों ने यूक्रेन से युद्ध के लिए रूस को अलग-थलग कर रखा है. ऐसे में पीएम मोदी के रूस दौरे पर पश्चिमी देश कड़ी नजर बनाए हुए हैं.
इस दौरे पर नजर चीन की भी है जिसने यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस के साथ अपने रिश्तों को ऐतिहासिक रूप से बढ़ाया है. भारत के प्रतिद्वंद्वी चीन और रूस की करीबी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यूक्रेन के साथ युद्ध शुरू होने के बाद से रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दो बार चीन जा चुके हैं जबकि वो एक बार भी भारत दौरे पर नहीं आए और पिछले साल सितंबर में आयोजित जी-20 की बैठक से भी उन्होंने दूरी बनाए रखी.
वहीं, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी युद्ध के बाद एक बार रूस का दौरा कर चुके हैं. ऐसे में अगर हम भारत-रूस रिश्तों की बात करते हैं तो इसमें चीन के फैक्टर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. कई विश्लेषकों का कहना है कि भारत-रूस की दोस्ती को अगर चीन की कसौटी पर कसा जाए तो ये उतनी खरी नहीं उतरती और भारत के लिए रूस कभी चीन के खिलाफ नहीं जाएगा.
भारत-रूस रिश्तों में चीन के फैक्टर को समझने के लिए हमें इतिहास में झांकना पड़ेगा जब रूस, भारत और चीन के साथ अपने मजबूत रिश्तों को लेकर बड़े धर्मसंकट में फंस गया था.
जब रूस ने भारत को रोक दी सैन्य विमानों की सप्लाई
साल था 1962 जब भारत और चीन के बीच युद्ध छिड़ गया था. तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पूरी उम्मीद थी कि भारत का पुराना दोस्त रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) उसका साथ देगा लेकिन तत्कालीन सोवियत संघ के राष्ट्रपति निकिता ख्रुश्चेव उसी दौरान क्यूबा मिसाइल संकट में उलझे थे.

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