
'पांच घंटे थाने में बैठाया, मेरी जान को भी खतरा…’ युवराज को बचाने के लिए गड्डे में उतरे चश्मदीद मनिंदर की आंखों देखी
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ग्रेटर नोएडा हादसे के चश्मदीद मनिंदर ने दावा किया कि युवराज को बचाने की कोशिश के बाद उन्हें पांच घंटे तक थाने में बैठाए रखा गया. मनिंदर का कहना है कि उन्होंने जो देखा, जो किया वही फिर से पुलिस वालों को बताया. वह कहते हैं कि इसके बाद भी उन्हें अपनी जान को खतरा महसूस हो रहा है. उनका आरोप है कि बड़े बिल्डर खुद को बचाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं.
ग्रेटर नोएडा की वह रात अब सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सवालों की एक लंबी फेहरिस्त बन चुकी है. सवाल सिस्टम पर हैं, सवाल जिम्मेदार एजेंसियों पर हैं और सवाल उस इंतजार पर हैं, जिसने एक होनहार इंजीनियर की जान ले ली. यह कहानी है उस चश्मदीद की, जिसने मौत को बहुत करीब से देखा, उसे रोकने की कोशिश की और अब उसी सच्चाई को बोलने की कीमत चुकाने का डर भी झेल रहा है. जी हां, मनिंदर, वही शख्स जिसने उस रात युवराज को बचाने के लिए जान जोखिम में डालकर गड्डे में उतरने की हिम्मत की. वही मनिंदर, जिसे अब यह कहने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि मेरी जान को भी खतरा हो सकता है.
घटना 16 तारीख की रात करीब 12 बजे की है. युवराज गुरुग्राम में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे, ड्यूटी खत्म कर नोएडा की ओर लौट रहे थे. उस रात धुंध इतनी घनी थी कि सड़क और गड्ढे का फर्क मिट चुका था. मनिंदर बताते हैं कि युवराज की गाड़ी ओवरस्पीड में नहीं थी, धुंध में जब कुछ दिखता ही नहीं, तो कोई 100–120 की रफ्तार से कैसे चला सकता है? नॉर्मल स्पीड होगी, 50 या 60 की. लेकिन रास्ते में एक खतरनाक सच्चाई उसका इंतजार कर रही थी. सड़क के किनारे बनी दीवार, जो करीब 15 दिन पहले एक ट्रक की टक्कर से टूट चुकी थी, अब भी उसी हालत में पड़ी थी. बिना किसी बैरिकेड, बिना चेतावनी के. युवराज की कार उसी टूटी दीवार से सीधे नाले में जा गिरी.
डेढ़ से दो घंटे तक जिंदा था युवराज
यह कोई पल भर का हादसा नहीं था. मनिंदर के मुताबिक, युवराज कम से कम डेढ़ से दो घंटे तक जिंदा था. वह मदद मांग रहा था, “हेल्प… हेल्प…” की आवाजे आ रही थीं. उसने किसी तरह कार से बाहर निकलकर ऊपर बैठने की कोशिश की, ताकि गाड़ी का बैलेंस न बिगड़े. उसने अपने मोबाइल की टॉर्च जलाई, ताकि लोग उसे देख सकें. यानी यह वह वक्त था, जब अगर समय पर रेस्क्यू होता, तो एक जान बच सकती थी.
फ्लिपकार्ट डिलीवरी से लौटते वक्त देखा मौत का मंजर
मनिंदर पेशे से फ्लिपकार्ट ग्रोसरी डिलीवरी से जुड़े हैं. उस रात उनका आखिरी ऑर्डर था. धुंध की वजह से वह भी देर से लौट रहे थे. तभी उन्होंने देखा कि वहां असामान्य हलचल है. मनिंदर बताते हैं कि जब मैं पहुंचा, तो पुलिस, फायर ब्रिगेड, SDRF—सब मौजूद थे. लोग बहुत थे, लेकिन कोई अंदर जाने को तैयार नहीं था. उनका कहना है कि मौके पर मौजूद एजेंसियों के पास संसाधनों की कमी नहीं थी. नाव थी, सेफ्टी जैकेट थी, सौ मीटर तक रस्सियां थीं. फिर भी कोई नाले में उतरने को तैयार नहीं था. मनिंदर बताते हैं कि फायर ब्रिगेड के कर्मचारियों का कहना था कि नाले में सरिया है, अंदर गए तो फंस सकते हैं. जोखिम था, यह सच है, लेकिन मनिंदर सवाल उठाते हैं कि क्या जोखिम से डरकर किसी को मरने के लिए छोड़ दिया जाए ? कमर में रस्सा बांधकर मनिंदर नाले में उतरे. यह सब उस वक्त हुआ, जब युवराज की आवाज कुछ मिनट पहले ही बंद हुई थी.

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