
नीतीश कुमार और शरद पवार के राज्यसभा जाने में कॉमन क्या है, और अलग क्या?
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नीतीश कुमार और शरद पवार देश के सबसे सीनियर राजनेताओं में शुमार हैं. उम्र में 10 साल का फासला जरूर है, लेकिन आज की तारीख में नीतीश कुमार और शरद पवार की राजनीतिक स्थिति करीब एक जैसी हो गई है - महज संयोग ही नहीं है कि दोनों एक साथ राज्यसभा में होंगे, भविष्य भी एक जैसा ही लगता है.
नीतीश कुमार और शरद पवार में पहली कॉमन चीज तो यही है कि दोनों का राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुना जाना तय हो गया है. और, अनकॉमन बात यह है कि नीतीश कुमार ने कभी नहीं कहा कि वो प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं, जबकि शरद पवार इस बारे में पहले ही अपना स्टैंड साफ कर चुके हैं.
नीतीश कुमार अब भी प्रधानमंत्री पद के वैसे ही दावेदार हैं, जैसे कांग्रेस ने विपक्षी खेमे में राहुल गांधी के लिए वो पोजीशन रिजर्व कर रखी है, यह बात अलग है कि विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक के नेतृत्व को लेकर भी गठबंधन में कभी सहमति नहीं बन सकी.
शरद पवार और नीतीश कुमार दोनों ही राज्यसभा में ऐसे वक्त जा रहे हैं, जब न तो उनके पास पहले जैसी सियासी ताकत बची है, न ही जोड़-तोड़ के मौके जो अपने-अपने स्तर पर अब तक करते आ रहे थे - और दोनों के राजनीतिक दलों पर भी अस्तित्व का खतरा मंडरा रहा है.
दांव पर विरासत, अस्तित्व का भी संकट
नीतीश कुमार और शरद पवार दोनों की राजनीतिक विरासत और उनके बनाए राजनीतिक दलों पर भी अस्तित्व का खतरा पैदा हो गया है. नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू तो बिहार और केंद्र की सरकार में साझीदार भी है, लेकिन शरद पवार तो फिलहाल दोनों ही जगह विपक्ष में हैं - लेकिन चुनौतियां दोनों के सामने मिलती जुलती ही हैं.
शरद पवार का राजनीतिक उत्तराधिकार पहले ही दो हिस्सों में बंट चुका था. अजित पवार के चले जाने के बाद भी उनका खेमा तो महाराष्ट्र की सत्ता में साझीदार भी है, और केंद्र में भी बीजेपी के साथ खड़ा है. लेकिन, शरद पवार के हिस्से में बचा-खुचा बहुत ही कम है. एनसीपी के दोनों गुटों के विलय की संभावना भी अब खत्म हो चुकी है - शरद पवार गुट के नेता जयंत पाटिल ने विलय की संभावनाओं पर बयान देकर फुल स्टॉप लगा दिया है.

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