
दोषी कौन? छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा गिरने के मामले में आमने-सामने PWD और नेवी
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महाराष्ट्र सरकार और भारतीय नौसेना इस प्रतिमा के गिरने को लेकर एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं. प्रतिमा की स्थिति के बारे में पता चलने के बाद किसी ने भी तुरंत कार्रवाई नहीं की और रखरखाव को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.
महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग स्थित राजकोट किले में 35 फीट ऊंची 17वीं शताब्दी के मराठा योद्धा छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा के 26 अगस्त को अचानक गिरने से बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. इस प्रतिमा का अनावरण पिछले साल 4 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नौसेना दिवस के अवसर पर किया गया था, जिससे इसकी जिम्मेदारी और रखरखाव को लेकर सवाल उठने लगे हैं.
'आजतक' ने इस घटना की गहराई से जांच की है और पाया कि इस मुद्दे पर जिम्मेदार एजेंसियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का खेल चल रहा है. एक पैनल इस घटना की जांच कर रहा है, और भारतीय नौसेना तथा लोक निर्माण विभाग (PWD) एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं.
PWD के सहायक अभियंता अजीत पाटिल ने इस घटना के संबंध में मालवन पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है.
प्रतिमा गिरने को लेकर मचे घमासान महाराष्ट्र सरकार और भारतीय नौसेना इस प्रतिमा के गिरने को लेकर एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं. प्रतिमा की स्थिति के बारे में पता चलने के बाद किसी ने भी तुरंत कार्रवाई नहीं की और रखरखाव को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.
प्रतिमा के अनावरण के बाद, राजकोट किले में पांच लाख से अधिक पर्यटक आए, लेकिन अनावरण के बाद रखरखाव की जिम्मेदारी को लेकर अस्पष्टता बनी रही. एफआईआर के अनुसार, PWD नियमित रूप से राजकोट किले के परिसर का निरीक्षण करता है. 20 अगस्त को एक निरीक्षण के दौरान, PWD ने प्रतिमा पर लगे नट और बोल्ट को जंग लगा पाया.
PWD ने 22 अगस्त को नौसेना को पत्र लिखा, लेकिन इसे नजरअंदाज कर दिया गया, जिसके चार दिन बाद प्रतिमा गिर गई. अगर समय पर कार्रवाई की गई होती तो यह घटना टल सकती थी.

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