
दिल्ली में क्लाउड सीडिंग फेल? बारिश तो नहीं हुई, लेकिन ट्रायल से क्या हासिल हुआ IIT कानपुर ने बताया
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दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए सरकार ने क्लाउड सीडिंग की. लेकिन यह कोशिश बेनतीजा रही. इस बीच मौसम वैज्ञानिक डॉ. अक्षय देओरास का कहना है कि फिलहाल मौसम की स्थिति इसके अनुकूल नहीं है. उन्होंने बताया कि आर्टिफिशियल रेन तभी संभव है जब बादलों में पर्याप्त नमी और ऊर्ध्वाधर विकास हो जो अभी दिल्ली में नहीं है.
राजधानी दिल्ली प्रदूषण की मोटी परत में घिरी है और सरकार आर्टिफिशियल रेन (कृत्रिम वर्षा) को एक आखिरी विकल्प के रूप में देख रही है. लेकिन मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी क्लाउड सीडिंग का समय बिल्कुल सही नहीं है.
नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंस, यूनिवर्सिटी ऑफ़ रीडिंग (यूके) के रिसर्च साइंटिस्ट डॉ. अक्षय देओरास बताते हैं कि क्लाउड सीडिंग एक ऐसी तकनीक है जिससे उन बादलों से बारिश कराई जाती है जिनमें पहले से पर्याप्त नमी मौजूद हो. डॉक्टर अक्षय के मुताबिक यह साफ आसमान से बारिश नहीं करा सकती.
इस प्रक्रिया में पहले संभावित वर्षा वाले बादलों की पहचान की जाती है. फिर विमान से सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड या कैल्शियम क्लोराइड जैसे रसायन बादलों के भीतर छोड़े जाते हैं, जिससे जलवाष्प छोटे-छोटे बूंदों में संघनित होकर वर्षा बन सके.
कब सफल होती है यह प्रक्रिया
डॉ. देओरास के अनुसार, क्लाउड सीडिंग तीन प्रकार के बादलों में की जा सकती है. पहला जब जमीन के पास के गर्म बादल हों. दूसरा जब गहराई वाले बादल जो तूफानी बादलों में बदल सकते हैं और तीसरा ऊंचाई पर ठंडे बादल मौजूद हों. लेकिन यह तभी असरदार होती है जब वायुमंडल में पर्याप्त नमी और बादलों में ऊर्ध्वाधर विकास (vertical development) हो.
डॉक्टर देओरास के मुताबिक आदर्श स्थिति तब होती है जब वातावरण में भरपूर नमी हो और बादल स्वाभाविक रूप से बारिश के लिए विकसित हो रहे हों. जैसे मानसून के बाद पश्चिमी विक्षोभ के दौरान दिल्ली-एनसीआर में होता है.

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