
...तो मालेगांव ब्लास्ट का गुनहगार कौन? साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित के बरी होने के बाद जांच पर उठे सवाल
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साल 2008 में धमाका हुआ. 11 आरोपियों के खिलाफ जांच हुई और 2025 में सब बरी कर दिए गए. 17 साल पहले एक धमाका हुआ, 6 लोग मारे गए, 101 जख्मी हुए. 17 साल बाद फैसला आया तो पता चला कि मालेगांव में धमाका करने के सभी आरोपी बेगुनाह हैं.
साल 2008 के मालेगांव बम धमाके के 17 साल बाद कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जांच एजेंसियों ने जिन लोगों के खिलाफ आरोप लगाए थे, वो सातों आरोपी निर्दोष हैं. क्योंकि उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत और गवाह मौजूद नहीं हैं. अदालत ने कहा कि सिर्फ नैरेटिव के आधार पर किसी को दोषी करार नहीं दिया जा सकता. जस्टिस लाहोटी ने फैसले में लिखा कि अभियोजन पक्ष ठोस सबूत और विश्वसनीय गवाह पेश नहीं कर सका.
अदालत ने माना कि आरडीएक्स और बम से लेकर बाइक के मालिकाना हक तक, घटनास्थल के सबूतों और फॉरेंसिक एनालिसिस से लेकर आरोपियों की फोन टैपिंग तक...अभिनव भारत के फंड का आतंक में इस्तेमाल से लेकर धमाके की साजिश तक एक भी आरोप एटीएस और एनआईए साबित नहीं कर सका.
इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दी जाएगी, सरकार देगी या नहीं, यह कहना मुश्किल है, लेकिन जिनके घर के लोग मारे गए हैं वो जरूर चुनौती दे सकते हैं. इस फैसले के साथ ही राजनीति में जबरदस्त जुबानी जंग शुरू हो गई है. बीजेपी के निशाने पर कांग्रेस है, आरोप लगाया जा रहा है कि कांग्रेस ने राजनीतिक फायदे की मंशा से हिंदू और भगवा आतंकवाद जैसे शब्द गढ़ने के लिए निर्दोष लोगों को फंसाया था.
बीजेपी के नेता जोरशोर से कहते नजर आ रहे हैं कि हिंदू कभी आतंकवादी नहीं हो सकता है. ऐसा ही केंद्रीय गृह मंत्री ने कल ही संसद में कहा था. उसे आज हर भाजपाई नेता दोहरा रहा है लेकिन पॉलिटिकल नैरेटिव, वोट बैंक के फायदे और अदालत के फैसले से आगे अहम सवाल जांच एजेंसियों की नाकामी को लेकर उठे हैं. क्या जांच एजेंसियां नाकाम हैं या सियासत कामयाब?
धमाका हुआ था, दोषी कोई नहीं...

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