डिक्शनरी से ओम और श्री जैसे शब्द हटाना चाहती है नेपाल सरकार, क्यों लग रहा धार्मिक साजिश का आरोप?
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कुछ सालों पहले तक जो नेपाल दुनिया का अकेला हिंदू राष्ट्र था, वहां अब नेपाली डिक्शनरी से ओम शब्द को हटाने की कवायद चल रही है. मौजूदा सरकार चाहती है कि ये शब्द हर हाल में हट जाए. वहीं दूसरा खेमा इसे नेपाली संस्कृति और धर्म पर हमला मानते हुए विरोध कर रहा है.
नेपाल की कुल आबादी में 80 प्रतिशत से भी ज्यादा हिंदू हैं, इसके बाद बौद्ध और बाकी धर्म आते हैं. अब इसी देश में ओम शब्द को हटाने पर बहस गरमाई हुई है. नेपाल के बहुत से लोगों का सोचना है कि ऐसे ही धार्मिक और आध्यात्मिक प्रतीक हटते रहे तो एक दिन नेपाल खत्म हो जाएगा. लेकिन सवाल ये है कि आखिर ओम शब्द से नेपाल सरकार को क्या परेशानी है, किस वजह से वो इसे अपने यहां से हटाना चाहती है?
करीब एक दशक से चल रही है कोशिश
साल 2012 में पहली बार इस बात पर चर्चा हुई कि डिक्शनरी से ओम शब्द को हटा दिया जाए. तब वहां के एजुकेशन मिनिस्टर दीनानाथ शर्मा थे. ये कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार थी, जिसपर चीन का भारी असर था. इसी बीच ओम को हटाने का प्रस्ताव आया, जिसपर एक कमेटी भी बनी. कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर हलंत वाले सारे शब्दों को हटाने की बात की गई.
ओम तो शामिल था ही, साथ ही हिंदू धर्म से जुड़े कई और शब्द भी थे, जैसे इंद्र, ब्राह्मण, बुद्ध, युद्ध, इंद्र, द्वंद्व और श्री. इसके तुरंत बाद नेपाल के शिक्षा मंत्रालय ने प्रज्ञा संस्थान से छपने वाले आधिकारिक नेपाली शब्दकोष से ओम शब्द को हटाने का आदेश दिया था. हालांकि कई वजहों से इसमें अड़चन आ गई और मामला टल गया.
साल 2016 में इसपर दो लोगों ने कोर्ट में याचिका दायर की. मामला अदालत तक पहुंचने के बाद सरकारी आदेश पर स्टे ऑर्डर लग गया. अब कोर्ट ने इसपर एक और कमेटी बनाने की बात की है ताकि तय हो सके कि ये शब्द डिक्शनरी में शामिल रहें, या हटा दिए जाएं. इसके बाद से ही बवाल मचा हुआ है. कई दलों का कहना है कि नेपाल सरकार पश्चिमी ताकतों के फेर में आकर उनके कल्चर को खत्म करना चाहती है.
ईसाई धर्म को मानने वाले तेजी से बढ़ रहे

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