
जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की रिहाई नीति पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, राज्यों पर उठाए सवाल
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम उत्तर प्रदेश में 75 जेलों को देख रहे हैं, यह जेल की बहुत बड़ी संख्या है. जबकि अन्य राज्यों में दो या तीन जेल हैं, इसलिए जब यह कानून होता है तो यह आपकी भीड़-भाड़ वाली जेलों को खाली करने में आपकी मदद कर सकता है.
देश भर की जेलो में बंद कैदियों की बदहाल स्थिति को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने विचाराधीन कैदियों और रिहाई की नीति पर विभिन्न राज्यों के हलफनामों पर चर्चा की. जस्टिस हृषीकेश रॉय और जस्टिस एसवीएन भट्टी की बेंच के समक्ष मामले की सुनवाई के दौरान एमाइकस क्योरे ने कोर्ट को बताया, "झारखंड में भी ऐसे बहुत सारे मामले लंबित हैं, उनमें रिहाई के हकदार कैदियों की कुल संख्या 23 है. अदालत में 17 मामले भेजे गए हैं, जबकि 6 कैदियों को सजा की अवधि पूरी होने से पहले उसने समय पूर्व रिहा किया गया है."
गोवा के वकील ने कोर्ट को बताया कि मैंने पिछली बार डेटा के साथ हलफनामा दायर किया था.आज भी इस मामले मे मुझे व्हाट्सएप पर जानकारी मिली है, दो-तीन दिन में हलफनामा दाखिल किया जाएगा. इस पर कोर्ट ने कहा, "आपका यह तरीका सही नहीं है, हमने मुख्य सचिवों से जानकारी मांगी थी,यह व्यक्तिगत आजादी का मामला है. इस मामले को आज सुनवाई के लिए इसीलिए सूचीबद्ध किया गया था, फिर भी वही स्थिति है."
'तथ्यात्मक विश्वसनीयता जरूरी'
कोर्ट ने पूछा कि मणिपुर की ओर से कौन पेश हो रहा है? मणिपुर के वकील ने कहा कि उन्होंने एक स्पष्ट बयान दिया है कि एक भी व्यक्ति रिहाई के योग्य नहीं पाया गया. कोर्ट ने कहा कि आपके दिए गए बयान में कुछ आंकड़े और तथ्यात्मक विश्वसनीयता होनी चाहिए. आपको पूरी जानकारी देनी होगी.
वहीं, यूपी सरकार के वकील ने कहा कि डेटा हिंदी में आया है, हमें हलफनामा अनुवाद करने और दाखिल करने के लिए दो दिन का वक्त चाहिए. गाजियाबाद में नोडल अधिकारियों से इसकी जानकारी मिली है. इस पर कोर्ट ने कहा कि आपको जानकारी कब मिली? हमने मुख्य सचिवों को पहले ही निर्देश भेजे थे, अब आप समझ गए होंगे कि हमें आपको यहां क्यों बुलाना पड़ा. जब राज्य और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा जानकारी दी जानी है, तो सरकार जवाब नहीं दे रही है.
यूपी सरकार से कोर्ट ने किया सवाल

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