
...जब डेड रिवर टेम्स की भयानक बदबू से संसद छोड़ भाग रहे थे लॉर्डस, पानी में भरा गया था ऑक्सीजन!
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'द ग्रेट स्टिंक' ने सचमुच अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था. नाक पर रूमाल रखकर ताजा हवा के लिए लगभग हांफते ब्रिटेन के सांसदों ने अर्बन प्लानिंग की दिशा में एक अभूतपूर्व कदम उठाया. ये फैसला टेम्स की धारा को नया जीवन देने वाली थी. ये फैसला लंदन में व्यापक सीवरेज सिस्टम बनाने का. ब्रिटेन इसमें सफल भी हुआ. लेकिन फिर आया सेकेंड वर्ल्ड वॉर. और जर्मनी ने लंदन के इस सिविल कंस्ट्रक्शन को तबाह कर दिया.
1858 की तपती गर्मी में टेम्स नदी से उठती भयानक बदबू ब्रिटिश पार्लियामेंट के भव्य हॉल में बेतरह बैचेनी भर रही थी. संसद में बैठने वाले 'लॉर्ड्स' के लिए ये बड़ी असहनीय स्थिति थी. कई माननीय सांसद तो पहले ही इससे बचने के लिए यहां से इंग्लैंड के गांवों की ओर निकल गए थे. लेकिन जो बच गए उनके लिए सचमुच में जिंदगी नरक थी.
अपनी नाक पर रूमाल रखकर ताजा हवा के लिए लगभग हांफते ब्रिटेन के सांसदों ने तब जो तय किया वो मानव के आधुनिक इतिहास में शहरी नियोजन (Urban planning) की दिशा में एक चमत्कारिक पहल थी.
टेम्स नदी से निकली दूषित वायु जो सांस लेना दूभर बना रही थी वैसी ही थी जैसा कि भभका कभी-कभी हम आजकल यमुना बेल्ट में महसूस करते हैं.
इतिहास दर्ज करने में माहिर अंग्रेजों ने 1858 के उस ग्रीष्म ऋतु के संकट को नाम दिया "Great stink" यानी कि 'भीषण बदबू'.
ब्रिटिश सांसदों ने इस बात पर सहमति जताई कि लंदन को उस "बुरी गंध" से मुक्त करने के लिए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है, जिसकी वजह से लंदन में हैजा, पेचिश और पेट की कई बीमारियां फैल रही थी और लोग मर रहे थे.
टेम्स का क्यों हुआ बुरा हाल?

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