
जजों को राजनीतिक दबाव, संस्थागत हस्तक्षेप व लोकप्रिय मांगों से मुक्त होना चाहिए: जस्टिस नागरत्ना
The Wire
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने केरल उच्च न्यायालय में जस्टिस टीएस कृष्णमूर्ति अय्यर मेमोरियल व्याख्यान देते हुए इस बात पर ज़ोर दिया कि न्यायाधीशों को राजनीतिक दबाव, संस्थागत हस्तक्षेप या लोकप्रियता से मुक्त होकर फैसला देना चाहिए. उन्होंने न्यायिक स्वतंत्रता में जजों की असहमति को भी महत्वपूर्ण बताया.
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने मंगलवार (3 मार्च) को कहा कि एक जज को अपना न्यायिक कर्तव्य का पालन करते समय सही फैसला लेने में हिचकिचाना नहीं चाहिए, भले ही इससे उन्हें प्रमोशन मिलना बंद हो जाए या सत्ता में बैठे लोग नाराज़ हो जाएं.
लाइव लॉ के मुताबिक, जस्टिस नागरत्ना ने केरल उच्च न्यायालय में दूसरा जस्टिस टीएस कृष्णमूर्ति अय्यर मेमोरियल व्याख्यान देते हुए इस बात पर ज़ोर दिया कि न्यायाधिशों को राजनीतिक दबाव, संस्थागत हस्तक्षेप या लोकप्रियता से मुक्त होकर फैसला देना चाहिए. उन्होंने न्यायिक स्वतंत्रता में जजों की असहमति को भी महत्वपूर्ण बताया.
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ‘न्यायिक स्वतंत्रता’ केवल राजनीतिक दबाव, संस्थागत हस्तक्षेप या लोकप्रिय मांगों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रत्येक न्यायाधीश को अपने सहयोगियों की राय से असहमत होने या उनसे भिन्न मत रखने की स्वायत्तता भी शामिल है.
असहमतिपूर्ण राय बौद्धिक स्वायत्तता की अभिव्यक्ति
द हिंदू ने जस्टिस नागरत्ना के हवाले से लिखा है कि न्यायिक स्वतंत्रता केवल राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाव तक ही सीमित नहीं है. इसके लिए यह भी आवश्यक है कि प्रत्येक न्यायाधीश को कानून के संबंध में अपना सुविचारित दृष्टिकोण बनाने और व्यक्त करने की स्वतंत्रता हो, भले ही वह दृष्टिकोण सहयोगियों से भिन्न हो.
उल्लेखनीय है कि जस्टिस नागरत्ना, जो 2027 में भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनने की कतार में हैं, अपने एकल असहमति वाले मतों के लिए व्यापक रूप से जानी जाती हैं. इसमें नोटबंदी मामले में संविधान पीठ में दिया गया उनका असहमति मत और 2025 में सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश की नियुक्ति की सिफारिश पर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में उनकी आपत्ति शामिल है.

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