
क्या सिर्फ रूस को रोकने के लिए ताकत जुटा रहा है NATO, कितना खतरनाक हो सकता है स्वीडन का इसमें शामिल होना?
AajTak
स्वीडन भी अब नाटो को हिस्सा बनने जा रहा है. इससे पहले तुर्की की नामंजूरी के चलते बार-बार ये देश नाटो की मेंबरशिप पाने से रह जाता था. इसी अप्रैल में फिनलैंड से भी तुर्की ने अपना अड़ंगा हटा लिया. क्या है नाटो, क्यों विकसित देश भी इसका हिस्सा बनना चाहते हैं, और कैसे तुर्की अक्सर इसपर वीटो लगाता रहा? समझिए सबकुछ.
लगभग डेढ़ साल पहले रूस और यूक्रेन में लड़ाई छिड़ने के बाद स्वीडन ने नाटो यानी उत्तर अटलांटिक संधि संगठन में शामिल होना होने की ख्वाहिश जताई थी, लेकिन तुर्की ने उसकी अर्जी को खारिज करवा दिया. उसके राष्ट्रपति तैयब एर्दोआन लगातार अड़े हुए थे कि वे इस देश को गठबंधन का हिस्सा नहीं बनने देंगे. बाद में एकदम से उनका रवैया बदला और स्वीडन के रास्ते खुल गए.
क्या है नाटो और क्या मकसद रहा?
ये एक मिलिट्री गठबंधन है. पचास के शुरुआती दशक में पश्चिमी देशों ने मिलकर इसे बनाया था. तब इसका इरादा ये था कि वे विदेशी, खासकर रूसी हमले की स्थिति में एक-दूसरे की सैन्य मदद करेंगे. अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा इसके फाउंडर सदस्थ थे. ये देश मजबूत तो थे, लेकिन तब सोवियत संघ (अब रूस )से घबराते थे. सोवियत संघ के टूटने के बाद उसका हिस्सा रह चुके कई देश नाटो से जुड़ गए. रूस के पास इसकी तोड़ की तरह वारसॉ पैक्ट है, जिसमें रूस समेत कई ऐसे देश हैं, जो पश्चिम पर उतना भरोसा नहीं करते.
कैसे मिलती है नाटो की सदस्यता? इसके लिए जरूरी है कि देश में लोकतंत्र हो. चुनावों के जरिए लीडर बनते हो. आर्थिक तौर पर मजबूत होना भी जरूरी है. लेकिन सबसे जरूरी है कि देश की सेना भी मजबूत हो ताकि किसी हमले की स्थिति में वो भी साथ दे सके. मेंबर बनने के लिए देश खुद तो दिलचस्पी दिखाता है, साथ ही पुराने सदस्य उसे न्यौता भी दे सकते हैं. इसके बाद ही मंजूरी मिलती है.
तुर्की क्यों रहा स्वीडन के खिलाफ? इसकी कई वजहों को मिलाकर एक ही कारण बनता है, वो ये कि स्वीडिश सरकार इस्लामोफोबिक है और तुर्की को परेशान करने का मौका खोजती रहती है. तुर्की में साल 2015 में तख्तापलट की कोशिश कर चुके कई लोगों को स्वीडन में शरण मिली थी. अब ये देश अपने उन लोगों को वापस चाहता है, ताकि सजा दे सके. स्वीडन में कुरान जलाने की भी घटना हो चुकी है. यही वजह है कि तुर्की राष्ट्रपति एर्दोआन पिछले साल से अब तक स्वीडन को नाटो से दूर रखे हुए थे.
हमेशा से सख्त रहे तुर्की ने अचानक स्वीडन के लिए उदार रुख अपनाते हुए अपना वीटो हटा दिया. अब स्वीडन भी आधिकारिक तौर पर नाटो का हिस्सा होगा. इससे स्वीडन को तो मिलिट्री एलायंस मिला ही, नाटो की भी ताकत बढ़ रही है. अब उसके पास सारे ताकतवर देश होंगे, जो रूस के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकते हैं.

इस वीडियो में जानिए कि दुनिया में अमेरिकी डॉलर को लेकर कौन सा नया आर्थिक परिवर्तन होने वाला है और इसका आपके सोने-चांदी के निवेश पर क्या प्रभाव पड़ेगा. डॉलर की स्थिति में बदलाव ने वैश्विक बाजारों को हमेशा प्रभावित किया है और इससे निवेशकों की आर्थिक समझ पर भी असर पड़ता है. इस खास रिपोर्ट में आपको विस्तार से बताया गया है कि इस नए भूचाल के कारण सोने और चांदी के दामों में क्या संभावित बदलाव आ सकते हैं तथा इससे आपके निवेश को कैसे लाभ या हानि हो सकती है.

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रिटेन के पीएम की मेजबानी करते हुए कहा है कि अंतरराष्ट्रीय कानून तभी सच में असरदार हो सकता है जब सभी देश इसका पालन करें. राष्ट्रपति शी ने अमेरिका का नाम लिए बिना कहा कि अगर बड़े देश ऐसा करेंगे नहीं तो दुनिया में जंगल का कानून चलेगा. विश्व व्यवस्था जंगल राज में चली जाएगी.

ईरान की धमकियों के जवाब में अमेरिका ने मध्य-पूर्व में अपने कई सहयोगियों के साथ सबसे बड़ा युद्धाभ्यास शुरू किया है. यह युद्धाभ्यास US एयर फोर्सेज सेंट्रल (AFCENT) द्वारा आयोजित किया गया है, जो कई दिनों तक चलेगा. इस युद्धाभ्यास की घोषणा 27 जनवरी को हुई थी और यह अभी भी जारी है. माना जा रहा है कि यह अभ्यास अगले दो से तीन दिनों तक चलेगा. इस प्रयास का मकसद क्षेत्र में तनाव के बीच सैन्य तैयारियों को बढ़ाना और सहयोगियों के साथ सामरिक तालमेल को मजबूत करना है.

कोलंबिया और वेनेज़ुएला की सीमा के पास एक जेट विमान अचानक लापता हो गया. यह विमान फ्लाइट नंबर NSE 8849 थी जो कुकुटा से ओकाना की ओर जा रही थी. इस विमान ने सुबह 11 बजकर 42 मिनट पर उड़ान भरी थी लेकिन लैंडिंग से पहले ही एयर ट्रैफिक कंट्रोल से संपर्क टूट गया. राडार से इस विमान का अचानक गायब होना चिंता का विषय है.

वेनेजुएला में मिली बड़ी कामयाबी के बाद अब डॉनल्ड ट्रंप का आत्मविश्वास आसमान छू रहा है। कूटनीति के गलियारों में चर्चा है कि ट्रंप के मुंह 'खून लग गया है' और अब उनकी नज़रें क्यूबा और ईरान पर टिक गई हैं... और अब वो कह रहे हैं- ये दिल मांगे मोर...। ट्रंप की रणनीति अब सिर्फ दबाव तक सीमित नहीं है, बल्कि वे सीधे सत्ता परिवर्तन के खेल में उतर चुके हैं। क्या क्यूबा और ईरान ट्रंप की इस 'मोमेंटम' वाली कूटनीति का मुकाबला कर पाएंगे?








