
कौन हैं अहमदिया मुस्लिम, जो पाकिस्तान से लेकर हिंदुस्तान तक अलगाव झेल रहे हैं, क्यों बाकी मुसलमान इन्हें अपनाने को तैयार नहीं?
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पचास के दशक में लाहौर में अहमदिया मुस्लिमों के खिलाफ पहला फसाद हुआ. पाकिस्तान की आवाम इन्हें काफिर कहते हुए मारकाट मचाने लगी. कहा जाता है कि कुछ सैकड़ा से लेकर हजारों अहमदिया इस कत्लेआम का शिकार हुए. इसके बाद से सिलसिला चला आ रहा है. पाकिस्तान तो छोड़िए, हिंदुस्तान के मुस्लिम भी अहमदियों से हाथ मिलाने को राजी नहीं.
आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड ने अहमदिया मुसलमानों को काफिर कहते हुए उन्हें मुस्लिम मानने से इनकार कर दिया. इसपर केंद्र ने कड़ी आपत्ति जताते हुए राज्य सरकार से मामले में दखल देने को कहा है. अब अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय इसे देखेगा. वैसे अहमदिया मुस्लिम भारत ही नहीं, पाकिस्तान में भी चरमपंथी सोच का शिकार होते रहे. समझिए, क्यों बाकी मुस्लिम समाज उन्हें अपनाने को तैयार नहीं. ऐसा क्या अलग है इस संप्रदाय में?
मोहम्मद साहब को आखिरी नबी नहीं मानते
ये सुन्नी मुस्लिमों की सब-कैटेगरी है, जो खुद को मुसलमान मानते हैं, लेकिन मोहम्मद साहब को आखिरी पैगंबर नहीं मानते. वे यकीन करते हैं कि उनके गुरु यानी मिर्जा गुलाम अहमद, मोहम्मद के बाद नबी (दूत या मैसेंजर) हुए थे. वहीं पूरी दुनिया में इस्लाम को मानने वाले मोहम्मद को ही आखिरी पैगंबर मानते रहे. यही बात अहमदिया मुस्लिमों को बाकियों से अलग बनाती है.
कैसे हुई शुरुआत? अहमदिया समुदाय को बनाने वाले मिर्जा गुलाम अहमद थे, जिनका जन्म पंजाब के कादियान में हुआ था. यही वजह है कि कई बार इन्हें मानने वाले खुद को कादियानी भी कहते हैं. मार्च 1889 में गुलाम अहमद ने लुधियाना में एक बैठक रखी, जहां उन्होंने अपने खलीफा होने का एलान किया. उसी रोज वहां कई लोगों ने गुलाम अहमद की बात मानी, जिसके बाद से अहमदिया जमात बढ़ती चली गई.
किस देश में कितनी आबादी?

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