
कारों को लेकर अमेरिका का ऐसा जुनून कि हर कार के लिए बनाया गया 6 गुना पार्किंग स्पेस, अब रहने के लिए कम पड़ी जगह
AajTak
अमेरिका में कार पार्किंग के लिए इतनी जगह बनी कि घरों के लिए स्पेस कम पड़ने लगा. डिजिटल एजेंसी 'हेजस एंड कंपनी' की स्टडी के अनुसार हर अमेरिकी कार के पास 6 से ज्यादा पार्किंग स्पेस है. अब कारों को लेकर अमेरिकी प्यार वहां रहने वालों पर भारी पड़ रहा है. उनके पास पार्किंग की तो जगह है, लेकिन रहने को घर नहीं है.
ड्राइव करने वालों के लिए ट्रैफिक जाम के बाद जो सबसे बड़ी मुश्किल होती है, वो है पार्किंग. अमेरिका में हालांकि ये दिक्कत नहीं दिखती. उनके पास गाड़ी पार्क करने के लिए स्पेस ही स्पेस है. साल 2022 के सितंबर में अमेरिका में 290 मिलियन से ज्यादा रजिस्टर्ड कारें थीं और ऐसी हर छोटी-बड़ी कार के लिए छह या सात पार्किंग लॉट थे.
कारों के लिए अमेरिकियों के प्यार को देखते हुए सिटी प्लानिंग कुछ ऐसी ही की गई. साल 1930 के बाद इसकी शुरुआत हुई. ये दूसरे विश्व युद्ध से पहले का दौर था, जब अमेरिका ताकतवर तो था, लेकिन सुपर पावर नहीं था. इसी समय सरकारी खजाना बढ़ाने के लिए एक प्रयोग किया गया.
ओकलाहोम राज्य कार पार्किंग के लिए हर घंटे के हिसाब से पैसे लेने लगा. लोगों ने पहले तो विरोध किया, फिर उन्हें सुविधाएं भी दिखने लगीं. वे बहुत कम चार्ज पर कार सड़क के किनारे खड़ी कर सकते और निश्चिंत होकर जा सकते थे. इसे पार्किंग लॉट कहा गया, जो लगातार लोकप्रिय होता गया. अगले एक दशक में देश में डेढ़ लाख से ज्यादा पेड पार्किंग स्पेस बन चुके थे.
हालांकि पेड पार्किंग स्पेस का आइडिया बाद में अन-अमेरिकी लगने लगा. इस देश के लोग आमतौर पर बड़ी कारों पर तो खर्च करते हैं, लेकिन पार्किंग स्पेस फ्री चाहते हैं. तब सरकार ने इसी तरह से सिटी प्लानिंग करनी शुरू की. हालांकि लोगों को खुश करने का इरादा भारी पड़ गया. कार पार्किंग स्पेस इतना बढ़ चुका है कि ये कनेक्टिकट और वरमाउंट को मिलाकर बने स्पेस से भी ज्यादा है.
इसका सबसे ज्यादा असर हाउसिंग पर हुआ. लॉस एंजिलस जैसे शहर की ही बात करें तो यहां लोगों के पास रहने के लिए घर नहीं जुट रहा है. लेकिन पार्किंग जरूरत से ज्यादा है. लेकिन सवाल ये आता है कि सिटी प्लानर्स ने घरों की बजाए पार्किंग एरिया क्यों ज्यादा बना डाले. तो इसका जवाब भी दूसरे विश्व युद्ध से जुड़ा है.
युद्ध के तुरंत बाद डॉलर के साथ-साथ अमेरिका का रुतबा सबसे ज्यादा हो गया. उसकी इकनॉमी तेजी से ऊपर आई. इसी दौरान वहां लोग कारें खरीदने लगे. पहले ये स्टेटस सिंबल था, लेकिन जल्दी ही वो समय आया, जब ये स्टेटस से बदलकर जरूरत कहलाने लगा.

लेकिन अब ये कहानी उल्टी घूमने लगी है और हो ये रहा है कि अमेरिका और चीन जैसे देशों ने अमेरिका से जो US BONDS खरीदे थे, उन्हें इन देशों ने बेचना शुरू कर दिया है और इन्हें बेचकर भारत और चाइना को जो पैसा मिल रहा है, उससे वो सोना खरीद रहे हैं और क्योंकि दुनिया के अलग अलग केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़ी मात्रा में सोना खरीदा जा रहा है इसलिए सोने की कीमतों में जबरदस्त वृद्धि हो रही हैं.

इस वीडियो में जानिए कि दुनिया में अमेरिकी डॉलर को लेकर कौन सा नया आर्थिक परिवर्तन होने वाला है और इसका आपके सोने-चांदी के निवेश पर क्या प्रभाव पड़ेगा. डॉलर की स्थिति में बदलाव ने वैश्विक बाजारों को हमेशा प्रभावित किया है और इससे निवेशकों की आर्थिक समझ पर भी असर पड़ता है. इस खास रिपोर्ट में आपको विस्तार से बताया गया है कि इस नए भूचाल के कारण सोने और चांदी के दामों में क्या संभावित बदलाव आ सकते हैं तथा इससे आपके निवेश को कैसे लाभ या हानि हो सकती है.

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रिटेन के पीएम की मेजबानी करते हुए कहा है कि अंतरराष्ट्रीय कानून तभी सच में असरदार हो सकता है जब सभी देश इसका पालन करें. राष्ट्रपति शी ने अमेरिका का नाम लिए बिना कहा कि अगर बड़े देश ऐसा करेंगे नहीं तो दुनिया में जंगल का कानून चलेगा. विश्व व्यवस्था जंगल राज में चली जाएगी.

ईरान की धमकियों के जवाब में अमेरिका ने मध्य-पूर्व में अपने कई सहयोगियों के साथ सबसे बड़ा युद्धाभ्यास शुरू किया है. यह युद्धाभ्यास US एयर फोर्सेज सेंट्रल (AFCENT) द्वारा आयोजित किया गया है, जो कई दिनों तक चलेगा. इस युद्धाभ्यास की घोषणा 27 जनवरी को हुई थी और यह अभी भी जारी है. माना जा रहा है कि यह अभ्यास अगले दो से तीन दिनों तक चलेगा. इस प्रयास का मकसद क्षेत्र में तनाव के बीच सैन्य तैयारियों को बढ़ाना और सहयोगियों के साथ सामरिक तालमेल को मजबूत करना है.

कोलंबिया और वेनेज़ुएला की सीमा के पास एक जेट विमान अचानक लापता हो गया. यह विमान फ्लाइट नंबर NSE 8849 थी जो कुकुटा से ओकाना की ओर जा रही थी. इस विमान ने सुबह 11 बजकर 42 मिनट पर उड़ान भरी थी लेकिन लैंडिंग से पहले ही एयर ट्रैफिक कंट्रोल से संपर्क टूट गया. राडार से इस विमान का अचानक गायब होना चिंता का विषय है.

वेनेजुएला में मिली बड़ी कामयाबी के बाद अब डॉनल्ड ट्रंप का आत्मविश्वास आसमान छू रहा है। कूटनीति के गलियारों में चर्चा है कि ट्रंप के मुंह 'खून लग गया है' और अब उनकी नज़रें क्यूबा और ईरान पर टिक गई हैं... और अब वो कह रहे हैं- ये दिल मांगे मोर...। ट्रंप की रणनीति अब सिर्फ दबाव तक सीमित नहीं है, बल्कि वे सीधे सत्ता परिवर्तन के खेल में उतर चुके हैं। क्या क्यूबा और ईरान ट्रंप की इस 'मोमेंटम' वाली कूटनीति का मुकाबला कर पाएंगे?







