
'कन्याकुमारी में साधना से निकले नए संकल्प...', नतीजों से पहले पीएम नरेंद्र मोदी का लेख
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वाकई, 2024 के चुनाव में कितने ही सुखद संयोग बने हैं. अमृतकाल के इस प्रथम लोकसभा चुनाव में मैंने प्रचार अभियान 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणास्थली मेरठ से शुरू किया. मां भारती की परिक्रमा करते हुए इस चुनाव की मेरी आखिरी सभा पंजाब के होशियारपुर में हुई. संत रविदास जी तपोभूमि, हमारे गुरुओं की भूमि पंजाब में आखिरी सभा होने का सौभाग्य भी बहुत विशेष है. इसके बाद मुझे कन्याकुमारी में भारत माता के चरणों में बैठने का अवसर मिला.
लोकसभा चुनाव 2024 के मंगलवार को नतीजे घोषित होंगे. देश की 543 सीटों पर सात चरणों में मतदान हुआ है. आखिरी चरण का प्रचार खत्म होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 30 मई को तमिलनाडु के कन्याकुमारी पहुंचे और वहां विवेकानंद रॉक मेमोरियल में 45 घंटे का ध्यान लगाया. वो एक जून की शाम वापस दिल्ली लौटे. इस दौरान उन्होंने कन्याकुमारी से दिल्ली लौटते वक्त अपने ध्यान से जुड़े अनुभवों को लेकर एक लेख कलमबद्ध किया है.
''लोकतंत्र की जननी में लोकतंत्र के सबसे बड़े महापर्व का एक पड़ाव पूरा हो रहा है. तीन दिन तक कन्याकुमारी में आध्यात्मिक यात्रा के बाद मैं दिल्ली जाने के लिए हवाई जहाज में आकर बैठा हूं... काशी और अनेक सीटों पर मतदान चल रहा है. कितने सारे अनुभव हैं. कितनी सारी अनुभूतियां हैं... मैं एक असीम ऊर्जा का प्रवाह स्वयं में महसूस कर रहा हूं.''
''वाकई, 2024 के चुनाव में कितने ही सुखद संयोग बने हैं. अमृतकाल के इस प्रथम लोकसभा चुनाव में मैंने प्रचार अभियान 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणास्थली मेरठ से शुरू किया. मां भारती की परिक्रमा करते हुए इस चुनाव की मेरी आखिरी सभा पंजाब के होशियारपुर में हुई. संत रविदास जी तपोभूमि, हमारे गुरुओं की भूमि पंजाब में आखिरी सभा होने का सौभाग्य भी बहुत विशेष है. इसके बाद मुझे कन्याकुमारी में भारत माता के चरणों में बैठने का अवसर मिला. उन शुरुआती पलों में चुनाव का कोलाहल मेरे मन-मस्तिष्क में गूंज रहा था. रैलियों में, रोड शो में देखे हुए अनगिनत चेहरे मेरी आंखों के सामने आ रहे थे. माताओं-बहनों-बेटियों के असीम प्रेम का वह ज्वार, उनका आशीर्वाद... उनकी आंखों में मेरे लिए विश्वास, दुलार... मैं सब कुछ आत्मसात कर रहा था. मेरी आंखें नम हो रही थीं... मैं शून्यता में जा रहा था, साधना में प्रवेश कर रहा था.''
''कुछ ही क्षणों में राजनीतिक वाद-विवाद, वार-पलटवार... आरोपों के स्वर और शब्द, वह सब अपने आप शून्य में समाते चले गए. मेरे मन में विरक्ति का भाव और तीव्र हो गया... मेरा मन बाह्य जगत से पूरी तरह अलिप्त हो गया. इतने बड़े दायित्वों के बीच ऐसी साधना कठिन होती है, लेकिन कन्याकुमारी की भूमि और स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा ने इसे सहज बना दिया. कन्याकुमारी के उगते सूर्य ने मेरे विचारों को नई ऊंचाई दी, सागर की विशालता ने मेरे विचारों को विस्तार दिया और क्षितिज के विस्तार ने ब्रह्माण्ड की गहराई में समाई एकात्मकता का निरंतर एहसास कराया. ऐसा लग रहा था, जैसे दशकों पहले हिमालय की गोद में किए गए चिंतन और अनुभव पुनर्जीवित हो रहे हैं.''
''कन्याकमारी संगमों के संगम की धरती है. हमारे देश की पवित्र नदियां अलग-अलग समुद्रों में जाकर मिलती हैं और यहां उन समुद्रों का संगम होता है. और यहां एक और महान संगम दिखता है- भारत का वैचारिक संगम. यहां विवेकानंद शिला स्मारक के साथ संत तिरुवल्लूवर की विशाल प्रतिमा, गांधी मंडपम और कामराजर मणि मंडपम हैं.''
''भारत हजारों वर्षों से विचारों के अनुसंधान का केंद्र रहा है. हमने जो अर्जित किया, उसे कभी अपनी व्यक्तिगत पूंजी मानकर आर्थिक या भौतिक मापदंडों पर नहीं तौला. इसीलिए इदं न मम यह भारत के चरित्र का सहज एवं स्वभाविक हिस्सा हो गया है. भारत के कल्याण से विश्व का कल्याण, भारत की प्रगति से विश्व की प्रगति, इसका एक बड़ा उदाहरण हमारी आजादी का आंदोलन भी है.''

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