
'एक्सपर्ट लाने के लिए अनिवार्य तरीका', लेटरल एंट्री के सपोर्ट में आए कांग्रेस सांसद शशि थरूर
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यूपीएससी लेटरल एंट्री के जरिए सीधे उन पदों पर उम्मीदवारों की नियुक्ति की जाती है, जिन पद पर आईएएस रैंक के ऑफिसर तैनात किए जाते हैं. यानी इन सिस्टम में विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और संगठनों में सीधे उपसचिव यानी ज्वाइंट सेक्रेटरी और डायरेक्टर/डिप्टी सेक्रेटरी के पद पर उम्मीदवारों की नियुक्ति होती है.
'बिना परीक्षा IAS' बनाने वाले सिस्टम यानी लेटरल एंट्री प्रोसेस इन दिनों चर्चा में है. कांग्रेस समेत कई विपक्षी पार्टियां लेटरल एंट्री से हो रही 45 नियुक्तियों का विरोध कर रही है. वहीं, केंद्र सरकार का तर्क है कि इसकी शुरुआत यूपीए सरकार के दौरान ही हुई थी. इसके पक्ष-विपक्ष में कई नेता बयान दे रहे हैं. इसी बीच कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने लेटरल एंट्री के सपोर्ट में उतरे हैं. उन्होंने कहा कि लेटरल एंट्री सरकारी सिस्टम में एक्सपर्ट्स की मौजूदगी के लिए अल्टीमेट तरीका है.
लेटरल एंट्री के सपोर्ट में उतरे शशि थरूर कांग्रेस नेता शशि थरूर ने 'एक्स' पर कहा कि लेटरल एंट्री सरकार के लिए किसी खास क्षेत्र में 'विशेषज्ञता' हासिल करने के लिए जरूरी है. इससे उन क्षेत्रों में कामकाज में मदद मिलती है, जिनके लिए हमारे पास एक्सपर्ट्स नहीं होते हैं. हालांकि, थरूर ने कहा कि थोड़े वक्त के लिए यह जरूरी कदम है. लेकिन लंबे समय के लिए मौजूदा नियमों के तहत भर्ती किए गए सरकारी अधिकारियों को सरकार द्वारा प्रशिक्षित किया जाना आवश्यक है.
आखिर है क्या लेटरल सिस्टम? अगर लेटरल सिस्टम की बात करें तो यूपीएससी लेटरल एंट्री के जरिए सीधे उन पदों पर उम्मीदवारों की नियुक्ति की जाती है, जिन पद पर आईएएस रैंक के ऑफिसर तैनात किए जाते हैं. यानी इन सिस्टम में विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और संगठनों में सीधे उपसचिव यानी ज्वाइंट सेक्रेटरी और डायरेक्टर/डिप्टी सेक्रेटरी के पद पर उम्मीदवारों की नियुक्ति होती है. इसमें निजी क्षेत्रों से अलग अलग सेक्टर के एक्सपर्ट्स को सरकार में इन पदों पर नौकरी दी जाती है. इस सिस्टम में यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में हिस्सा नहीं लेता है और बिना एग्जाम में इंटरव्यू के जरिए प्राइवेट सेक्टर के एक्सपर्ट्स की इन पदों पर नियुक्ति की जाती है.
यूपीए सरकार और लेटरल एंट्री... कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार सबसे पहले लेटरल एंट्री कॉन्सेप्ट लेकर आयी थी. साल 2005 में दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग (Admin Reforms Commission) का गठन किया गया और वरिष्ठ कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली इस आयोग के अध्यक्ष थे. ‘कार्मिक प्रशासन का नवीनीकरण-नई ऊंचाइयों को छूना’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में आयोग की एक प्रमुख सिफारिश यह थी कि उच्च सरकारी पदों जिसके लिए विशेष ज्ञान और कौशल की आवश्यकता होती है, उन पर लेटरल एंट्री शुरू की जाए.
ब्यूरोक्रेसी में लेटरल एंट्री की शुरुआत कब हुई? नीति आयोग ने 2017 में अपने तीन-वर्षीय एक्शन एजेंडा पर प्रस्तुत रिपोर्ट में केंद्र सरकार में मध्य और वरिष्ठ स्तर पर लेटरल एंट्री के जरिए नियुक्ति की सिफारिश की थी. इसमें कहा गया था कि लेटरल एंट्री के जरिए नियुक्त होने वाले अधिकारी केंद्रीय सचिवालय का हिस्सा होंगे. लेटरल एंट्री के तहत होने वाली नियुक्तियां 3 साल के कॉन्ट्रैक्ट पर होंगी, जिसे कुल मिलाकर 5 साल तक बढ़ाया जा सकता है. उस समय तक केंद्रीय सचिवालय में सिर्फ करियर डिप्लोमैट (सिविल सेवा के अधिकारी) ही नियुक्त होते थे.
लेटरल एंट्री के तहत नियुक्ति की लिए पहली बार 2018 में आवेदन मंगाया गया. लेकिन यह भर्ती सिर्फ संयुक्त सचिव स्तर के पदों के लिए थी. निदेशक और उप सचिव स्तर के पद लेटरल एंट्री के लिए बाद में खोले गए. कैबिनेट की नियुक्ति समिति (Appointments Committee of the Cabinet) द्वारा नियुक्त एक संयुक्त सचिव, किसी विभाग में तीसरा सबसे बड़ा पद (सचिव और अतिरिक्त सचिव के बाद) होता है, और उक्त विभाग में एक विंग के प्रशासनिक प्रमुख के रूप में कार्य करता है.

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