
इसके हैं कई पैर, घूम रहा है जंगल में, Alien से हो रही तुलना देखें PHOTOS
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ऑस्ट्रेलिया की सनशाइन कोस्ट यूनिवर्सिटी के अनुसार, कनखजूरे की प्रजातियों की खोज तब की गई जब शोधकर्ता तंजानिया के उडजुंगवा पर्वत में पेड़ों और उस पर लदी बेलों के विकास का अध्ययन कर रहे थे.
वैज्ञानिकों ने जंगल में कई पैरों वाले ऐसे प्राणियों की खोज की है, जिन्हें पहले कभी नहीं देखा गया. इनकी तुलना एलियंस से की जा रही है. यहां कनखजूरा के एक नए प्रकार और पांच नई प्रजातियों की खोज की गई है. ये खोज दक्षिणपूर्वी अफ्रीका के तंजानिया के जंगल में हुई.
ऑस्ट्रेलिया की सनशाइन कोस्ट यूनिवर्सिटी के अनुसार, कनखजूरे की प्रजातियों की खोज तब की गई जब शोधकर्ता तंजानिया के उडजुंगवा पर्वत में पेड़ों और उस पर लदी बेलों के विकास का अध्ययन कर रहे थे.
यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एंडी मार्शल ने कहा कि जंगल की गीली मिट्टी के बीच उनकी टीम को कनखजूरे की नई प्रजातियां मिलीं, जिनके सिर काफी अलग तरह के थे. मार्शल ने कहा, 'हम जंगलों की रिकवरी का पता लगाने के लिए अपने फील्डवर्क के दौरान सभी आकार के कनखजूरों का रिकॉर्ड रखते हैं, क्योंकि वे जंगलों के विकास के संकेतक हैं. लेकिन हमें इन प्रजातियों के महत्व का एहसास तब तक नहीं हुआ, जब तक कि मिरियापोडोलॉजिस्ट ने हमारे सैंपल्स का मूल्यांकन नहीं किया.'
उन्होंने कहा कि नए खोजे गए कनखजूरे कुछ सेंटीमीटर लंबे हैं और प्रत्येक के लगभग 200 पैर हैं. सबसे बड़े अफ्रीकी कनखजूरे 35 सेंटीमीटर या लगभग 14 इंच तक लंबे हो सकते हैं. मिसौरी संरक्षण विभाग के अनुसार, उत्तरी अमेरिका में मिली सबसे बड़ी प्रजाति की लंबाई लगभग आधी यानी 15 सेंटीमीटर या 6 इंच है. मार्शल ने कहा कि इस नई खोज से पता चलता है कि जंगलों में अभी कितनी खोज करनी बाकी है.
यूनिवर्सिटी के मुताबिक, जो नया प्रकार मिला है, उसे Udzungwastreptus नाम दिया गया है. वहीं पांच नई प्रजातियों को लोफोस्ट्रेप्टस मैगोम्बेरा, अटेम्सोस्ट्रेप्टस कैटारैक्टी, अटेम्सोस्ट्रेप्टस लेप्टोपटिलोस, अटेम्सोस्ट्रेप्टस जूलोस्ट्रिएटस और उडजुंगवास्ट्रेप्टस मारियाना नाम दिए गए हैं. इन जीवों के सैंपल को डेनमार्क की कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम में लाया गया है.

सैकड़ों साल पहले तबाह हो चुके एक रोमन शहर की दीवार पर करीब 2000 साल पुराने लव लेटर्स लिखे हुए मिले हैं. यह खोज आज की उन्नत और आधुनिक तकनीक का नतीजा है. क्योंकि, जिस दीवार पर ये ग्रैफिटी बने थे, वो काफी पहले खुदाई में मिल गए थे, लेकिन उन पर उकेरे गए भित्तिचित्रों को समझना मुश्किल था. अब जाकर पुरातत्वविदों को इसका मतलब पता चला है.

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