
इंडिया टुडे के स्वर्णिम 50 साल- पार्ट 1: आपातकाल, इंदिरा की हत्या और भोपाल गैस त्रासदी... झकझोर देने वाले दशक की कहानी
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इंडिया टुडे ग्रुप ने अपनी 50वीं वर्षगांठ के मौके पर भारतीय पत्रकारिता में अपने प्रभावशाली सफर को दर्शाने वाली पांच-एपिसोड की डॉक्यूमेंट्री सीरीज रिलीज की है. इसमें 1975 से 1985 तक के दशक के उन महत्वपूर्ण राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक घटनाक्रमों का जिक्र है, जिन्होंने राष्ट्र को आकार दिया.
देश के प्रतिष्ठित मीडिया ग्रुप इंडिया टुडे ने अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूरे कर लिए हैं. इस ऐतिहासिक सफर में कई यादगार मील के पत्थर पड़े. इंडिया टुडे ने अपने 50 वर्षों की खट्टी-मीठी यादों को दर्ज करते हुए 'इंडिया टुडे @50' नाम से 5 एपिसोड की एक स्पेशल डॉक्यूमेंट्री सीरीज बनाई है, जिसका पहला एपिसोड शनिवार को रिलीज हुआ. इस डॉक्यूमेंट्री सीरीज के पहले एपिसोड में 1975 से 1985 तक के उस दशक पर केंद्रित है, जिसे आधुनिक भारत के सबसे उथल-पुथल भरे वर्षों में गिना जाता है.
यह वही दौर था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की, अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार लॉन्च हुआ, इंदिरा गांधी की हत्या हुई, देश में सिखों के खिलाफ हिंसा भड़की और राजनीतिक उथल-पुथल ने भारतीय लोकतंत्र और पत्रकारिता—दोनों की कड़ी परीक्षा ली. इस डॉक्यूमेंट्री के पहले एपिसोड में आपातकाल के उन वर्षों के बारे में जिक्र है, जब नागरिक स्वतंत्रताएं निलंबित थीं, विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया था और प्रेस सेंसरशिप के तहत काम कर रही थी.
इसी माहौल में इंडिया टुडे की शुरुआत हुई. मैगजीन के पूर्व संपादकों- शेखर गुप्ता और कावेरी बामजेई ने डॉक्यूमेंट्री में उस दौर के अपने अनुभव साझा किए हैं. वे आपातकाल के दौरान इंडिया टुडे मैगजीन शुरू करने के फैसले को साहसिक और जोखिम भरा कदम बताते हैं. आर्काइवल कॉन्टेंट और प्रत्यक्ष गवाहियों के जरिए एपिसोड दिखाता है कि कैसे एक छोटी-सी युवा टीम ने डर और प्रेस सेंसरशिप वाले उस दौर में पत्रकारिता को जीवित रखा. डॉक्यूमेंट्री में इंडिया टुडे ग्रुप के चेयरपर्सन और एडिटर-इन-चीफ अरुण पुरी मैगजीन की एडिटोरियल डिसिप्लिन को याद करते हैं.
वह बताते हैं कि कैसे हर स्टोरी के लिए रिपोर्टर और राइटर को यह सुनिश्चित करना पड़ता था कि वह उस समय क्यों महत्वपूर्ण है, किसे प्रभावित करती है और आगे उसका क्या प्रभाव होगा. मजबूत लेखन और विजुअल स्टोरीटेलिंग के साथ इस दृष्टिकोण ने इंडिया टुडे को राष्ट्रीय घटनाओं को स्पष्टता और तात्कालिकता के साथ घर-घर पहुंचाने में सफल बनाया. 'इंडिया टुडे @50' डॉक्यूमेंट्री के पहले एपिसोड में आपातकाल, जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले आंदोलन, विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी और 1977 के नाटकीय चुनावों जैसे राजनीतिक घटनाक्रमों का जिक्र है.
इसमें यह भी बताया गया है कि कैसे देश में आपातकाल हटने के बाद दबी हुई कहानियों के लिए रास्ते खुल गए, जिसने इंवेस्टिगेटिव और लॉन्ग-फॉर्म जर्नलिज्म के लिए नए स्टैंडर्ड सेट किए. राजनीति के अलावा, यह डॉक्यूमेंट्री उस दशक में भारतीय समाज के बदलाव को भी रेखांकित करती है. हिंदी फिल्मों में 'एंग्री यंग मैन' के उदय से लेकर 1983 के विश्व कप विजय तक- ये पल देश की बदलती आकांक्षाओं और आत्मविश्वास को दर्शाते हैं. इसमें बताया गया है कि कैसे ओपिनियन पोल, बिजनेस रिपोर्टिंग और फोटो जर्नलिज्म ने इंडिया टुडे के संपादकीय दायरे को विस्तार दिया और पत्रिका के 50 वर्षों के इस सफर में मील के पत्थर बने.

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