
अमेरिकी ग्रोथ का इंजन हैं NRI, ट्रंप ने किया बाहर तो अमेरिका को कौन बनाएगा ग्रेट अगेन?
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अमेरिका में भारतीय-अमेरिकी समुदाय का आर्थिक योगदान बहुत बड़ा है जहां वो बड़े कंपनियों के CEO और यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स के सह-संस्थापक हैं. हाल ही में H-1B वीजा नियमों में कड़े बदलावों ने भारतीय प्रोफेशनल्स को मुश्किल में डाल दिया है. मार्क मिशेल जैसे विश्लेषक भारतीय प्रवासियों के खिलाफ नफरत भरे बयान देते हैं, जबकि सच्चाई ये है कि भारतीय प्रवासी अमेरिकी अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं.
अमेरिका के ट्रंप समर्थक MAGA (Make America Great Again) एक्टिविस्ट्स और वहां के मूल निवासी हमेशा उधार के मंचों से भाषण देते आए हैं. सर्वे कराने वाले मार्क मिशेल जो कि अब 'डी-इंडियनाइजेशन कंसल्टेंसी' की ब्रांडिंग कर रहे हैं, वो इस विडंबना का जीवंत उदाहरण हैं: एक देश जिसे बाहरी यूरोपीय लोगों ने आकर बसाया और आकार दिया वो अब भारतीय टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट्स को खतरा बता रहा है.
विदेशियों से नफरत करने वाले ये लोग ही असली घुसपैठिए हैं जिन्होंने अमेरिकी सपने और संसाधनों को हथिया लिया है. भारत-विरोधी उनकी बयानबाजी विडंबना, पाखंड और पिछली बातों को भूलने की उनकी बीमारी, इन तीनों का हास्यास्पद संगम है.
क्रिस्टोफर कोलंबस ने जब अमेरिका का समुद्री रास्ता खोज लिया तब वहां बड़ी संख्या में लोग पहुंचने लगे जिसमें तीर्थयात्री, एडवेंचर ढूंढने वाले लोग, धार्मिक असहमति के शिकार लोग और बंधुआ मजदूर शामिल थे.
इतनी बड़ी संख्या में प्रवासियों के आने से अमेरिका में जनसंख्या का विस्फोट हुआ. 1820 तक यूरोपीय मूल के 20 लाख प्रवासी अमेरिका में बस चुके थे. 1892 से 1954 तक, न्यूयॉर्क हार्बर स्थित एलिस आइलैंड में 1.2 करोड़ से ज्यादा प्रवासी आए, जिनमें मुख्यतः दक्षिणी व पूर्वी यूरोप के इटैलियन, आयरिश, पोलैंड के लोग और यहूदी समुदाय शामिल थे. यह ‘अमेरिकन ड्रीम’ का प्रतीक था, जहां नए लोगों को अवसर मिलता था.
लेकिन एक ही पीढ़ी के भीतर, अमेरिका जाकर बसे लोगों ने खुद को वहां का स्थायी निवासी मान लिया. जो लोग खुद यूरोप से आकर अमेरिका में बसे, अब उन्होंने ही यूरोप से आने वालों के लिए रास्ते बंद करने शुरू कर दिए. 1924 के इमिग्रेशन एक्ट जैसी नीतियां लाकर उन्होंने उन्हीं समुदायों की इमिग्रेशन दर 80% से अधिक घटा दी, उन्हें सांस्कृतिक रूप से हीन और अमेरिका के लिए आर्थिक खतरा बताकर.
मार्क मिशेल का इतिहास-विरोधी विश्लेषण और इसमें जेनोफोबिया (विदेशी विरोधी) का इंजेक्शन मिलाना, दोनों यही काम करता है.

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