
UGC के नए नियम पर 'सुप्रीम' फैसले से थमेगा विवाद? अब सामने हैं ये पांच सवाल
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17 दिन पहले लागू हुए यूजीसी के नए नियम को शीर्ष अदालत ने अगली सुनवाई तक रोकते हुए केंद्र सरकार और यूजीसी से जवाब मांगा है. तब तक 2012 का पुराना नियम ही लागू रहेगा. अब इस पूरे घटनाक्रम में पांच ऐसे सवाल उभरकर सामने आए हैं, जो आने वाले समय में इस विवाद की दिशा तय करेंगे.
यूजीसी (UGC) के नए नियम पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद देश की राजनीति और विश्वविद्यालय परिसरों में उठता विवाद फिलहाल थमता दिख रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विराम स्थायी है या आने वाले दिनों में यह मुद्दा नए सिरे से और ज्यादा तीखा होकर लौटेगा. 17 दिन पहले लागू हुए यूजीसी के नए नियम को शीर्ष अदालत ने अगली सुनवाई तक रोकते हुए केंद्र सरकार और यूजीसी से जवाब मांगा है. तब तक 2012 का पुराना नियम ही लागू रहेगा.
इस फैसले के बाद जहां सवर्ण समाज के कई संगठन और छात्र सड़कों पर मिठाइयां बांटते नजर आए, वहीं पिछड़े और वंचित वर्गों में असमंजस और चिंता का माहौल है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार के कई जिलों में जश्न का माहौल देखने को मिला. लखनऊ, मथुरा, चंदौली और गोरखपुर जैसे शहरों में सवर्ण समाज के लोगों ने लड्डू, पेड़ा बांटे और नारेबाजी की. साधु-संतों से लेकर छात्र संगठनों तक ने इसे न्याय की जीत बताया. सवाल यह है कि जिस फैसले से अगड़ा वर्ग राहत महसूस कर रहा है, क्या वही फैसला पिछड़े वर्गों को स्वीकार होगा?
दरअसल, यूजीसी के नए नियम कॉलेज और विश्वविद्यालय परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों से जुड़े थे. इन नियमों का उद्देश्य भेदभाव रोकना बताया गया था, लेकिन सवर्ण समाज के संगठनों का आरोप था कि नियम अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका ज्यादा है. इसी आशंका को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणियां कीं.
सुप्रीम कोर्ट ने की सख्त टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि नियम पहली नजर में अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब भेदभाव की परिभाषा पहले से मौजूद है तो जाति-आधारित भेदभाव को अलग से परिभाषित करने की जरूरत क्यों पड़ी. सीजेआई सूर्यकांत की टिप्पणी सबसे ज्यादा चर्चा में रही, जब उन्होंने कहा, “हमने जातिविहीन समाज की दिशा में जो भी प्रगति की है, क्या अब हम फिर से पीछे की ओर जा रहे हैं?”
यही वे टिप्पणियां हैं, जिनके बाद सवर्ण समाज के प्रदर्शनकारियों को लगा कि उनकी आशंकाओं को सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीरता से सुना है. गौरतलब है कि इस मुद्दे पर प्रदर्शन सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं थे. हापुड़ में बीजेपी कार्यालय तक विरोध पहुंचा, ‘बीजेपी मुर्दाबाद’ के नारे लगे और कई जगहों पर नेताओं को वोट न देने के पोस्टर तक लगाए गए. स्थिति यह थी कि कई सांसद और मंत्री कैमरे के सामने खुलकर बोलने से बचते दिखे.

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