
UCC पर उत्तराखंड में प्रयोग, देशभर में बनेगा माहौल... कितना काम आएगा बीजेपी का ये दांव? समझिए रणनीति
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भारत का संविधान धर्म के आधार पर किसी नागरिक के अधिकारों में भेदभाव नहीं करता है और संविधान की इसी भावना को मूर्त रूप देने के दावे के साथ उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने मंगलवार को विधानसभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड बिल पेश कर दिया है. उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता कानून बनाना बीजेपी का चुनावी घोषणापत्र वाला वादा था. धामी सरकार ने जन आकांक्षाओं के मुताबिक वो कानून बना दिया है.
उत्तराखंड के लिए आज ऐतिहासिक दिन है. यहां मंगलवार को विधानसभा के पटल पर समान नागरिक संहिता (UCC) बिल पेश किया गया है. सदन में बीजेपी विधायकों ने जय श्रीराम के नारे लगाए. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे इतिहास की युगांतकारी घटना बताया है. राज्य सरकार जल्द ही इस विधेयक को कानून का रूप देकर पूरे राज्य में लागू करने वाली है. वहीं, देश में भी इस समय समान नागरिक संहिता को लेकर बहस छिड़ गई है. उत्तराखंड को मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा है. सवाल ये है कि आखिर बीजेपी का ये दांव कितना काम आएगा और ये आम चुनाव से पहले बीजेपी की कोई रणनीति का हिस्सा है?
बता दें कि यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए उत्तराखंड की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय कमेटी गठित की थी. चार दिन पहले ही सीएम को 740 पेज की ड्राफ्ट कमेटी की रिपोर्ट सौंपी गई थी. समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक का उद्देश्य नागरिक कानूनों में एकरूपता लाना है. यानी प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान कानून होना. समान नागरिक संहिता में शादी, तलाक और जमीन-जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा. सभी पंथ के लोगों के लिए विवाह, तलाक, भरण-पोषण, विरासत और बच्चा गोद लेने में समान रूप से कानून लागू होगा.
'यूसीसी लागू करने वाला पहला राज्य बनेगा उत्तराखंड'
फिलहाल, आजादी के बाद उत्तराखंड देश में यूसीसी लागू करने वाला पहला राज्य बनने जा रहा है. हालांकि, पुर्तगाली शासन के दिनों से गोवा में भी यूसीसी लागू है. संविधान में गोवा को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है. गुजरात और असम समेत देश के कई बीजेपी शासित राज्यों ने उत्तराखंड यूसीसी को एक मॉडल के रूप में अपनाने की इच्छा जाहिर की है. इस विधेयक में 400 से ज्यादा प्रावधान किए गए हैं. शादी से लेकर लिव इन रिलेशन तक पर सख्त नियम बनाए गए हैं. हालांकि, इस विधेयक में जो विशेष प्रावधान किए गए हैं, उन्हें लेकर विवाद खड़ा हो सकता है. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का मानना है कि ये मुसलमानों पर यह कानून हम पर थोपने की तरह है. अगर इसे लागू किया जाता है तो मुस्लिमों के कई अधिकार खत्म हो जाएंगे. जैसे- तीन शादियों का अधिकार नहीं रहेगा. शरीयत के हिसाब से संपत्ति का बंटवारा नहीं होगा.
'केंद्र सरकार भी दिखा रही है दिलचस्पी'
बताते चलें कि उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता कानून बनाना बीजेपी का चुनावी घोषणापत्र वाला वादा था. धामी सरकार ने जन आकांक्षाओं के मुताबिक वो कानून बना दिया है. अब केंद्र सरकार की ओर से भी कहा जा रहा है कि विधि आयोग की रिपोर्ट के बाद इस दिशा में विचार किया जाएगा. देश के 22वें विधि आयोग ने पिछले साल UCC पर सार्वजनिक और धार्मिक संगठनों से अपनी राय देने के लिए कहा था. फिलहाल, देश में सभी नागरिकों के लिए एक समान 'आपराधिक संहिता' है, लेकिन समान नागरिक कानून नहीं है.

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