
SIR से जुड़े आरोपों के पीछे छुपा है कम मार्जिन वाली सीटों का डर
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SIR पर अखिलेश यादव और ममता बनर्जी की एक जैसी फिक्र की बड़ी वजह है हार जीत के कम अंतर वाली विधानसभा सीटें. ये भी देखा गया है कि इन सीटों पर विधानसभा चुनावों की तुलना में 2024 के लोकसभा चुनाव में समीकरण काफी बदल गए - सपा और टीएमसी दोनों को अब आगे की चिंतापरेशान करने लगी है.
चुनाव तो पहले पश्चिम बंगाल में होना है, लेकिन SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण पर उत्तर प्रदेश में भी सियासी हलचल उतनी ही है. पश्चिम बंगाल में अप्रैल-मई में विधानसभा चुनाव होने हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में करीब एक साल बाद 2027 में होंगे - लेकिन अखिलेश यादव अभी से ममता बनर्जी की राह पकड़ ली है.
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तो सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गई हैं. कोर्ट जाकर अपनी दलीलें भी रख आई हैं. यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी समाजवादी पार्टी के भी वही रास्ता अख्तियार करने की बात कर रहे हैं.
पीटीआई के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में अंतिम वोटर लिस्ट 28 फरवरी तक जारी किए जाने की संभावना है. उत्तर प्रदेश में भी एसआईआर की प्रक्रिया आखिरी चरण में है, और रिपोर्ट के मुताबिक, वहां फाइनल वोटर लिस्ट 10 अप्रैल को प्रकाशित की जानी है.
पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में एक जैसी चिंता क्यों?
उत्तर प्रदेश में एसआईआर प्रक्रिया पर चिंता जताते हुए हाल ही में अखिलेश यादव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था, एसआईआर के जरिए ही वे बिहार चुनाव जीतने में सफल हुए हैं... इसमें एसआईआर की अहम भूमिका रही है.
और, वैसे ही पश्चिम बंगाल को लेकर भी आशंका जाहिर की थी, बीजेपी पश्चिम बंगाल में भी वही करने की कोशिश कर रही है... इसलिए वहां की सरकार, और मुख्यमंत्री बार-बार कह रही हैं कि चुनाव आयोग बीजेपी का आयोग बन गया है.

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