
IPC Section 84: विकृतचित व्यक्ति के बारे में प्रावधान करती है आईपीसी की धारा 84
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आईपीसी (IPC) की धारा 84 (Section 84) में विकृतचित (Disproportionate) व्यक्ति के कार्य को लेकर प्रावधान किया गया है. तो चलिए जानते हैं कि आईपीसी की धारा 84 इस बारे में क्या जानकारी देती है?
भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) में अदालत (Court), पुलिस (Police) और अन्य कानूनी एजेंसियों (Legal agencies) की कार्य प्रणाली से जुड़े कई तरह के कानूनी प्रावधान (Legal provision) मिलते हैं. इसी तरह से आईपीसी (IPC) की धारा 84 (Section 84) में विकृतचित (Disproportionate) व्यक्ति के कार्य को लेकर प्रावधान किया गया है. तो चलिए जानते हैं कि आईपीसी की धारा 84 इस बारे में क्या जानकारी देती है?
आईपीसी की धारा 84 (Indian Penal Code Section 84) IPC यानि भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 84 (Section 84) के मुताबिक कोई बात अपराध (Offense) नहीं है, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है, जो उसे करते समय चित्त-प्रकृति (Mind-nature) के कारण उस कार्य की प्रकृति (Nature of Work), या यह कि जो कुछ वह कर रहा है वह दोषपूर्ण (Defective) या विधि के प्रतिकूल (Contrary to law) है, जानने में असमर्थ (Incapable) होता है.
साधारण शब्दों में कहें तो आईपीसी की धारा 84 बताती है कि ऐसा व्यक्ति जो मन की अस्वस्थता के कारण कोई काम करते वक्त यही नहीं जान पाता कि उस कार्य की प्रकॄति क्या है, या ये कि जो कुछ वह कर रहा है वह गलत या कानून के खिलाफ है तो ऐसे में उसके द्वारा किया गया संबंधित कार्य अपराध नहीं माना जाएगा.
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क्या होती है आईपीसी (IPC) भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) IPC भारत में यहां के किसी भी नागरिक (Citizen) द्वारा किये गये कुछ अपराधों (certain offenses) की परिभाषा (Definition) और दंड (Punishment) का प्रावधान (Provision) करती है. आपको बता दें कि यह भारत की सेना (Indian Army) पर लागू नहीं होती है. पहले आईपीसी (IPC) जम्मू एवं कश्मीर में भी लागू नहीं होती थी. लेकिन धारा 370 हटने के बाद वहां भी आईपीसी लागू हो गई. इससे पहले वहां रणबीर दंड संहिता (RPC) लागू होती थी.
अंग्रेजों ने लागू की थी IPC ब्रिटिश कालीन भारत (British India) के पहले कानून आयोग (law commission) की सिफारिश (Recommendation) पर आईपीसी (IPC) 1860 में अस्तित्व में आई. और इसके बाद इसे भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) के तौर पर 1862 में लागू किया गया था. मौजूदा दंड संहिता को हम सभी भारतीय दंड संहिता 1860 के नाम से जानते हैं. इसका खाका लॉर्ड मेकाले (Lord Macaulay) ने तैयार किया था. बाद में समय-समय पर इसमें कई तरह के बदलाव किए जाते रहे हैं.

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